मुनि योगसागर जी बोले- जो सुख चाहते हो वही दूसरों को दो, यही सच्चा धर्म है
कोटा नसियां जी में सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन मुनि योगसागर जी ने धर्म, मंगलाचरण और लोककल्याण का महत्व बताया।

तस्वीर में नसियां जी में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव के दौरान मुनिश्री योगसागर जी महाराज के सानिध्य में उपस्थित श्रद्धालु और गणमान्य लोग नजर आ रहे हैं।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव के चौथे दिन श्रद्धा, साधना, भक्ति और आध्यात्मिक चेतना का विशेष वातावरण रहा। प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिरस से गुंजायमान रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, विधान एवं मंगल आरती में भाग लेकर आत्मकल्याण और समस्त जीवों के मंगल की कामना की।
मंदिर के निदेशक हुकम जैन 'काका' एवं अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि प्रातःकाल विधि-विधानपूर्वक भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा तथा सिद्धचक्र महामंडल विधान सम्पन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ अर्घ्य समर्पित कर धर्मलाभ अर्जित किया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि धर्म ही जीवन का सर्वोच्च रत्न है। जो आत्मा धर्म को अपने जीवन में धारण करती है, वही वास्तविक सुख, शांति, पवित्रता और आत्मानंद का अनुभव करती है।
मुनिश्री ने कहा कि भगवान की दिव्य वाणी पापों का क्षय करने वाली, आत्मा को निर्मल बनाने वाली और मोक्षमार्ग का प्रकाश करने वाली है। इसी कारण प्रत्येक धार्मिक कार्य का प्रारंभ मंगलाचरण से किया जाता है।
उन्होंने मंगलाचरण के महत्व को समझाते हुए कहा कि मंगलाचरण तीन प्रकार का होता है—प्रथम मंगल, मध्य मंगल और अंत मंगल। प्रथम मंगल विद्या एवं शुभ कार्य के प्रारंभ में किया जाता है। मध्य मंगल अध्ययन एवं साधना की निर्विघ्न पूर्णता के लिए किया जाता है। अंत मंगल अर्जित ज्ञान को धर्ममय जीवन में परिणत करने की भावना से किया जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि भगवान की वाणी स्वयं मंगलमयी है, फिर भी उसके प्रति श्रद्धा, विनय और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मंगलाचरण आवश्यक माना गया है। मंगलाचरण से मन के भाव निर्मल होते हैं, पुण्य का अर्जन होता है और प्रत्येक शुभ कार्य सफलता एवं मंगल के साथ सम्पन्न होता है।
लोककल्याण की भावना को धर्म का वास्तविक स्वरूप बताते हुए मुनि श्री ने भगवान महावीर के वर्धमान स्वरूप की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि 'मान' का अर्थ ज्ञान है और जिनका ज्ञान पूर्ण रूप से विकसित एवं प्रकाशित हो चुका है, वे ही वर्धमान कहलाते हैं। तीर्थंकरों को अरिहंत इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे समस्त जीवों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मुनि श्री ने कहा, "जो सुख अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो — यही सच्चा धर्म है।"
उन्होंने कहा कि धर्म किसी संप्रदाय, जाति अथवा व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं है। धर्म शुद्ध परिणामों, करुणा, समता और लोककल्याण की भावना का नाम है। जब तक समाज का प्रत्येक व्यक्ति सुखी और प्रसन्न नहीं होगा, तब तक व्यक्तिगत सुख भी पूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए धर्म का उद्देश्य केवल अपना नहीं, बल्कि समस्त जीवों के मंगल चिंतन का होना चाहिए।
मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के चतुर्थ दिवस 128 ऋद्धियों के अर्घ्य अत्यंत श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ समर्पित किए गए। श्रद्धालुओं ने विधिपूर्वक अभिषेक, पूजन, अर्घ्य समर्पण एवं मंगल आरती में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया। संपूर्ण मंदिर परिसर णमोकार महामंत्र, जैन भक्ति गीतों एवं जयघोष से गूंजता रहा। विधान के दौरान विश्वशांति, आत्मकल्याण एवं समस्त प्राणियों के मंगल की मंगलकामना की गई।
समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, श्री हुकम जैन 'काका' हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा किया गया।
समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री संजय जी एवं श्रीमती बीना जी लुहाड़िया परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया तथा संजय जी निर्वाण ने मुनिश्री का मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।
भक्तामर विधान एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री बहादुरमल जी, श्रीमती सुशीला जी तथा श्रीमती कमलेश जी एवं श्री चक्रेश जी कोटिया परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
प्रशासनिक मंत्री पारस दोराया ने बताया कि आज मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य श्री तेजकुमार जी एवं श्रीमती कमलेश जी खटोड़ परिवार को प्राप्त हुआ। सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन धार्मिक अनुष्ठानों और मुनिश्री के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को धर्म, करुणा और लोककल्याण के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।

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