शिक्षा नगरी कोटा की साहित्यिक धरा पर साहित्य, संस्कृति और भारतीय चिंतन की त्रिवेणी में डूबे अखिल भारतीय साहित्य परिषद, राजस्थान के दो दिवसीय 9वें प्रदेश अधिवेशन का रविवार को भव्य समापन हुआ। ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ के उद्घोष के साथ आयोजित इस महाकुम्भ ने अमिट छाप छोड़ते हुए साहित्य को नई दिशा देने का आह्वान किया। समापन सत्र का शुभारंभ मुख्य अतिथि कृषि विश्वविद्यालय कोटा की कुलगुरु प्रो. विमला डूंकवाल, बड़े महाप्रभु मंदिर पाटनपोल के अधिष्ठाता परम पूज्य विनय कुमार जी महाराज, राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल, राष्ट्रीय मंत्री भरत ठाकोर, निवर्तमान प्रदेशाध्यक्ष डॉ. अन्नाराम शर्मा, नवनिर्वाचित प्रदेशाध्यक्ष सुरेन्द्र सिंह राव, प्रदेश महामंत्री विष्णु शर्मा हरिहर, प्रदेश कोषाध्यक्ष डॉ. केशव शर्मा एवं कोटा महानगर के महेश विजय ने दीप प्रज्वलन कर किया।

अधिवेशन के अंतिम दिन नवीन प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा की गई, जिसमें सुरेन्द्र सिंह राव को प्रदेश अध्यक्ष, विष्णु शर्मा हरिहर को प्रदेश महामंत्री, डॉ. केशव शर्मा को प्रदेश कोषाध्यक्ष, डॉ. ओमप्रकाश भार्गव को प्रदेश संयुक्त महामंत्री, विपिन चंद्र को प्रदेश संगठन मंत्री, मोनिका गौड़ को मंत्री तथा राजेन्द्र गौड़ को प्रदेश प्रचार संयोजक का दायित्व सौंपा गया। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अन्नाराम शर्मा को लोक साहित्य का राष्ट्रीय समन्वयक, उमेश चौरसिया को बाल साहित्य प्रदेश संयोजक तथा महेश विजय को कोटा महानगर की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई।

मुख्य अतिथि प्रो. विमला डूंकवाल ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि वही रचना वास्तविक साहित्य है जो समाज और राष्ट्र के हित को साधती हो। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में साहित्य को ऑडियो रूप में युवाओं तक पहुँचाने का सुझाव दिया। राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवनपुत्र बादल ने ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि भारतबोध की जड़ें सनातन परंपरा में निहित हैं, जिन्हें औपनिवेशिक काल में विकृत करने का विफल प्रयास किया गया। वहीं, विनय कुमार जी महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता को भारत का मूल ज्ञान बताते हुए 9वें अंक को पूर्णता का प्रतीक और शुभ संकेत करार दिया।

इस अवसर पर नौ पुस्तकों का ऐतिहासिक लोकार्पण हुआ, जिसमें 13 वर्षीया नन्हीं साहित्यकार वर्षा कंवर का उपन्यास 'वीररक्त' विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इनके साथ ही अखिलानंद पाठक द्वारा संपादित कहानी संग्रह, मयंक सहल का काव्य संकलन 'कुर्सी', शैलजा विजयवर्गीय का 'अन्तर्मन की गठरी', मोहनलाल वर्मा का 'हकीकत', डॉ. ओमप्रकाश भार्गव का 'कुटुम्बकम्', कृष्णा सिन्हा का 'मैं तूलिका उकेरती', विष्णु शर्मा हरिहर के बाल संग्रह 'जीत गए हैं बच्चे' व 'रेल चली जी रेल' तथा शक्ति सिंह गुर्जर की 'रणथम्भोर का इतिहास' का विमोचन हुआ।

अधिवेशन में राष्ट्रीय मंत्री भरत ठाकोर द्वारा प्रस्तुत एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव में राजस्थान सरकार से मांग की गई कि सरकारी पुस्तकालयों को साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र बनाकर प्राचीन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जाए और उन्हें 'ज्ञान भारतम्' योजना से जोड़ा जाए। उन्होंने संगठन की नींव में कार्यकर्ताओं और वैचारिकता को सर्वोपरि बताया। 'साहित्य परिक्रमा' के संपादक डॉ. इन्दुशेखर तत्पुरुष ने हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर पत्रिका के वैचारिक ताप को रेखांकित किया। वर्ष 1966 से भारतीय चिंतन को सशक्त कर रही परिषद का यह आयोजन प्रदेश कोषाध्यक्ष डॉ. केशव शर्मा के संचालन और विष्णु शर्मा हरिहर के धन्यवाद ज्ञापन के साथ संपन्न हुआ, जिसने राजस्थान में साहित्यिक चेतना का नया संचार किया है।

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