कोटा में रोटरी क्लब ने शुरू किया थैलेसीमिया जांच एवं जागरूकता अभियान
बसंत विहार में आयोजित शिविर में विशेषज्ञों ने हीमोग्लोबिन विकार के लक्षण बताते हुए बोन मैरो ट्रांसप्लांट और जीन थेरेपी जैसे आधुनिक उपचार साझा किए।

कोटा के बसंत विहार स्थित रोटरी क्लब बिल्डिंग में शनिवार को आयोजित थैलेसीमिया जांच एवं जागरूकता अभियान के दौरान मंच पर मंचासीन क्लब के पदाधिकारी और चिकित्सा विशेषज्ञ जनता को संबोधित करते हुए।
शिक्षा नगरी कोटा में आनुवंशिक रक्त विकार 'थैलेसीमिया' को जड़ से मिटाने और आमजन को इसके खतरों के प्रति सचेत करने के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण जन-जागरूकता एवं जांच अभियान का शंखनाद किया गया है। रोटरी क्लब कोटा नॉर्थ द्वारा शनिवार को बसंत विहार स्थित रोटरी क्लब बिल्डिंग में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम ने शहर में स्वास्थ्य चेतना की एक नई अलख जगा दी है। इस महाअभियान की शुरुआत एक उच्च स्तरीय जागरूकता बैठक तथा व्यापक जन-जागरूकता रैली के साथ हुई, जिसमें शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और आम जनता ने भारी संख्या में अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर इस गंभीर बीमारी के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं क्लब के सचिव डॉ. आरबी गुप्ता ने थैलेसीमिया की भयावहता पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित जनसमूह को आगाह किया कि यह एक अत्यंत गंभीर आनुवंशिक रक्त विकार है। उन्होंने चिकित्सकीय दृष्टिकोण साझा करते हुए बताया कि इस बीमारी के कारण मानव शरीर में हीमोग्लोबिन के निर्माण की प्राकृतिक प्रक्रिया पूरी तरह प्रभावित हो जाती है। चूंकि हीमोग्लोबिन लाल रक्त कोशिकाओं में पाया जाने वाला वह मुख्य और महत्वपूर्ण प्रोटीन है जो पूरे शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचाने का जीवनदायी कार्य करता है, इसलिए इसकी भारी कमी होने के चलते पीड़ित रोगी को अत्यंत घातक एनीमिया जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जीवनभर जूझना पड़ता है।
इस संवेदनशील मुद्दे पर आगे बात करते हुए क्लब के अध्यक्ष विनय अग्निहोत्री ने बीमारी के शारीरिक लक्षणों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति में अत्यधिक थकान, निरंतर कमजोरी बने रहना, त्वचा व आंखों का रंग असामान्य रूप से पीला पड़ना, बार-बार बुखार आना तथा हड्डियों में विकृति (डिफॉर्मिटी) पैदा होना इसके प्रमुख व शुरुआती लक्षण हैं। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यदि सही समय पर रक्त की जांच करा ली जाए और समाज में इसे लेकर जागरूकता हो, तो इस लाइलाज मानी जाने वाली बीमारी से पूरी तरह बचाव संभव है।
चिकित्सकीय सत्र में डॉ. चंद्रमान सिंह राजावत ने बीमारी के आंतरिक कुप्रभावों को रेखांकित करते हुए बताया कि थैलेसीमिया के कारण शरीर में स्प्लीन (प्लीहा) का आकार खतरनाक रूप से बढ़ सकता है। उन्होंने इसके प्रबंधन पर बात करते हुए कहा कि पीड़ित के उपचार में नियमित अंतराल पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन (रक्त आधान) करना बेहद महत्वपूर्ण और अनिवार्य भूमिका निभाता है। इसके साथ ही, बार-बार खून चढ़ाने से शरीर में आयरन (लोह तत्व) की अत्यधिक अधिकता हो जाती है, जिसे नियंत्रित करने के लिए मरीज को 'आरण चेलेशन थेरेपी' देना नितांत आवश्यक हो जाता है।
आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. आर.वी. गुप्ता ने पीड़ित मानवता के लिए नई उम्मीदें जगाईं। उन्होंने फोलिक एसिड सप्लीमेंटेशन, बोन मैरो ट्रांसप्लांट (अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण) तथा अत्याधुनिक जीन थेरेपी को थैलेसीमिया के क्षेत्र में आज के समय का सबसे आधुनिक, उन्नत और स्थायी प्रभावी उपचार विकल्प बताया। कार्यक्रम के तकनीकी सत्र के समापन पर डॉ. सुनील रावत ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त करते हुए इस अभियान की प्रासंगिकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में रोटरी क्लब द्वारा वहां उपस्थित सभी लोगों की निशुल्क थैलेसीमिया जांच की गई और उन्हें इस बीमारी से खुद को और आने वाली पीढ़ी को बचाने के लिए आवश्यक चिकित्सकीय परामर्श व जागरूकता सामग्री वितरित की गई। यह अभियान कोटा में स्वास्थ्य सुधार की दिशा में एक युगांतकारी कदम साबित होने जा रहा है।

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