कोटा, 11 मार्च। श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति, कोटा जंक्शन द्वारा संचालित ‘श्रीराम ज्योति’ पत्रिका के “विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध विधेयक” विशेषांक का भव्य विमोचन कार्यक्रम बुधवार सायंकाल माधव भवन, श्रीराम मंदिर में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला सेशन एवं सत्र न्यायाधीश सत्यनारायण व्यास थे, जबकि मुख्य वक्ता के रूप में धर्म जागरण समन्वय, राजस्थान क्षैत्र के क्षेत्रीय संयोजक श्री ललित शर्मा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष डॉ. सुधीर उपाध्याय ने की। इस दौरान प्रबंध समिति के सभापति महेश वर्मा एवं पत्रिका के संपादक चंद्रशेखर शर्मा भी मंचासीन रहे और कार्यक्रम का कुशल संचालन अनिल जैन द्वारा किया गया।

सनातन धर्म और मतांतरण के वैश्विक संघर्ष पर प्रकाश

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता ललित शर्मा ने राजस्थान सरकार के इस विधेयक की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि "यूं तो सनातन हिंदू सभ्यता में धर्म का मुख्य अर्थ कर्तव्य होता है। धारण करने योग्य कर्तव्यों का समूह—धरती माता के प्रति कर्तव्य, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, माता-पिता के प्रति कर्तव्य—अर्थात कर्तव्यों के प्रति संकल्पित होना ही धर्म है।" शर्मा ने जोर देते हुए कहा कि "विश्व में एक ही धर्म है, वह है सनातन हिंदू धर्म। अन्य मत हैं, जिनमें मान्यता एक पुस्तक, एक ईश्वर और एक पूजा-स्थल तक सीमित होती है।" उन्होंने आगे कहा कि हमारी संस्कृति बहुदेववाद और विविध श्रेष्ठताओं का समूह है, किंतु इस्लाम और ईसाइयत ने अपनी मान्यताओं को जबरदस्ती दूसरों पर थोपा है। इसी जबरदस्ती से सुरक्षा के लिए राजस्थान सरकार ने यह कानून बनाया है।

संवैधानिक मर्यादा और सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

क्षेत्रीय संयोजक शर्मा ने भारत पर हुए धर्मांतरणकारी आक्रमणों का उल्लेख करते हुए संविधान के अनुच्छेद 25 के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘रेव. स्टेनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ प्रकरण में स्पष्ट किया है कि "अनुच्छेद 25 में प्रचार करने के अधिकार का मतलब दूसरों को अपने धर्म में जबरन परिवर्तित करने का अधिकार नहीं है। यह मौलिक अधिकार केवल अपने धर्म के सिद्धांतों को फैलाने का है।"

कानून के कड़े प्रावधान और सजा का विवरण

मुख्य अतिथि जिला सेशन एवं सत्र न्यायाधीश सत्यनारायण व्यास ने स्पष्ट किया कि राज्य का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन प्रलोभन और षड्यंत्र से होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए यह कठोर कानून आवश्यक है। उन्होंने बताया कि "अब गैर-कानूनी तरीके से कराया गया धर्मांतरण संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है तथा इसमें कठोर कारावास की व्यवस्था है।" विशेष परिस्थितियों में अपराधी को दस से बीस वर्ष तक की सजा हो सकती है। महिला, एससी/एसटी, दिव्यांग और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में कानून अत्यधिक सख्त है। यदि कोई धर्मांतरण करना चाहता है, तो उसे जिला कलेक्टर को आवेदन करना होगा और जांच के बाद ही अनुमति मिल सकेगी। साथ ही, इस कानून में अपने मूल धर्म में वापस आने की पूर्ण छूट दी गई है।

सामाजिक एकजुटता और कानून का महत्व

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सुधीर उपाध्याय ने कहा कि हमारा सनातन सृष्टि के प्रारंभ से है और हमें जातियों के विभाजन को समाप्त कर इसे पुनः पूर्ण प्रतिष्ठा के साथ स्थापित करना है। उन्होंने जानकारी दी कि राजस्थान देश का 12वां प्रदेश है जहाँ यह प्रभावी कानून लागू है। सभापति महेश वर्मा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि "कानून की सार्थकता तभी है जब उसका कठोरता से पालन हो।" कार्यक्रम के अंत में अतिथियों को स्मृति-चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। इस गरिमामय अवसर पर परमानंद शर्मा, प्रतापभान सिंह, अर्जुन सिंह चंदेल, हरी शर्मा, राजेंद्र चावला, देवकीनंदन शर्मा, रघुनंदन विजय, कृष्ण कुमार अय्यर सहित समिति के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

Pratahkal Bureau

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