कोटा में जमीन विवाद को लेकर हजारों ग्रामीणों का प्रदर्शन, सौंपा ज्ञापन
केडीए और वन विभाग की कार्रवाई के विरोध में ग्रामीणों ने संभागीय आयुक्त कार्यालय का घेराव किया। विभिन्न मांगों को लेकर राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन।

मंच पर बैठे धीरज गुर्जर, प्रहलाद गुंजल और अन्य स्थानीय प्रतिनिधि तथा उनके सामने सीएडी सर्कल पर विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्रित बड़ी संख्या में ग्रामीण।
कोटा के सीएडी सर्कल पर उस समय जनसैलाब उमड़ पड़ा जब हजारों की संख्या में ग्रामीण केडीए, वन विभाग और पुलिस की कथित ज्यादतियों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने के लिए सड़कों पर उतर आए। ट्रैक्टर-ट्रालियों, मिनी ट्रकों और दोपहिया वाहनों का उपयोग कर कोटा के ग्रामीण सभा स्थल पर एकत्रित हुए और प्रशासन के खिलाफ अपना आक्रोश व्यक्त किया। इस विरोध प्रदर्शन ने उस समय एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया जब प्रदर्शनकारियों ने एक विशाल रैली निकालकर संभागीय आयुक्त कार्यालय तक मार्च किया और अपनी मांगों को लेकर राज्यपाल के नाम एक ज्ञापन सौंपा।
प्रदर्शन के दौरान ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय सचिव धीरज गुर्जर ने सरकार और प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन ग्रामीणों की पुश्तैनी जमीनें छीनकर धन्नासेठों को लाभ पहुंचाना चाहता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह केवल रोजगार की नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है और यदि प्रशासन ने ग्रामीणों की मांगें नहीं मानीं, तो कोटा की धरती पर महापड़ाव डाला जाएगा। वहीं, पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल ने वन विभाग और पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगाते हुए कहा कि अमरकुआं गांव में गर्भवती महिला के साथ दुर्व्यवहार और ग्रामीणों को प्रताड़ित करना अमानवीय है। उन्होंने सवाल किया कि क्या सरकार का काम आमजन के अधिकारों की रक्षा करना नहीं है?
गुंजल ने वन अधिकार अधिनियम 2006 का हवाला देते हुए प्रशासन को आईना दिखाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि उक्त कानून के तहत तीन पीढ़ियों या 75 वर्षों से वन भूमि पर रह रहे निवासियों को बेदखल नहीं किया जा सकता, लेकिन प्रशासन इन नियमों का उल्लंघन कर रहा है। उन्होंने प्रशासन पर आरोप लगाया कि पिछले 20 वर्षों में काश्तकारों के अधिकारों को बहाल करने के बजाय सीधे केडीए के नाम जमीन आवंटित कर दी गई। इसके अलावा, खानपुर विधायक सुरेश गुर्जर ने भी इस संघर्ष को किसान, मजदूर और पशुपालकों के अस्तित्व की लड़ाई करार देते हुए एकजुटता का आह्वान किया।
इस पूरे घटनाक्रम पर कोटा के सांसद पर भी निशाना साधा गया, जिन पर ग्रामीणों की जमीनें छीनकर औद्योगिक घरानों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया गया। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में वन अधिकार अधिनियम 2006 का अनुपालन, विपरीत कब्जे के प्रावधानों के तहत आवंटन, आदिवासी समुदाय के वन उपज पर अधिकारों की सुरक्षा और राणपुर थाने में हुई घटना की उच्च स्तरीय जांच शामिल है। ज्ञापन सौंपे जाने के बाद संभागीय आयुक्त ने इस पर विचार करने के लिए प्रशासन की ओर से 15 दिनों का समय मांगा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार ग्रामीणों के पक्ष में कोई सकारात्मक निर्णय लेती है या फिर हाड़ौती क्षेत्र में एक बड़े महापड़ाव का सूत्रपात होगा।

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