रामकथा के सातवें दिवस में गुरुदेव जयकीर्ति ने दी धर्म, नीति और वैराग्य की महती शिक्षा
कोटा में रामकथा के सातवें दिवस पर गुरुदेव जयकीर्ति ने धर्म, नीति और वैराग्य के संदेश देते हुए राम—सीता मिलन, रावण—लक्ष्मण युद्ध और केवलज्ञान प्राप्ति के अद्भुत प्रसंगों से धर्मसभा को मंत्रमुग्ध कर दिया। कथा ने उपस्थित जनसमूह को भक्ति और आध्यात्मिक अनुभूति से ओत-प्रोत कर दिया।

कोटा। विशिष्ट रामकथाकार एवं अनुष्ठान विशेषज्ञ धर्मचक्रवर्ती गुरुदेव जयकीर्ति जी ने पद्मपुराण आधारित रामकथा के सातवें दिवस पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन में धर्म, नीति और वैराग्य के महत्व पर गहन प्रकाश डाला। सभा में उपस्थित श्रद्धालु राम—सीता की महिमा, रावण—लक्ष्मण युद्ध और केवलज्ञान प्राप्ति के अद्भुत प्रसंगों से मंत्रमुग्ध हो उठे।
गुरुदेव ने कहा कि “जो व्यक्ति कल्याणकारी वचन सुनता और कहता है, वही वास्तविक मानव है; अन्य केवल मनुष्याकार पुतलों के समान हैं।” उन्होंने रामकथा श्रवण को जीवन में चेतना और क्रियाशीलता लाने का सर्वोत्तम साधन बताया। कथा में हनुमान, अंगद और भामंडल के माध्यम से अमृततुल्य आरोग्यजल लाने, द्रोणमेघ राजा की विशल्या को भेजने तथा युद्धभूमि में लक्ष्मण के उपचार की कथा को अत्यंत भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत किया।
गुरुदेव ने रावण की नीति-चर्चा, स्वर्णखंभों से युक्त शांतिनाथ जिनालय में उसके पूजन और बहुरूपिणी विद्या साधना के प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि रावण की हठ और सीता प्राप्ति की लालसा अंततः उसके विनाश का कारण बनी। दस दिनों तक चले रावण—लक्ष्मण युद्ध का रोमांचक विवरण देते हुए गुरुदेव ने बताया कि जब रावण ने चक्ररत्न का प्रयोग किया, तो वह लक्ष्मण के हाथ में पहुँचकर अंततः उसके वक्षस्थल को भेद गया।
राम द्वारा रावण, कुम्भकर्ण, मेघवाहन और इंद्रजीत के दाह संस्कार, विभीषण एवं रावण परिवार को सांत्वना देने के प्रसंग ने सभा में गहरी छाप छोड़ी। इस दौरान 56 हजार मुनियों के साथ अनंतवीर्य मुनिराज का लंका आगमन और रात्रि के अंतिम प्रहर में केवलज्ञान की प्राप्ति, देवगणों द्वारा ज्ञानोत्सव तथा इंद्रजीत, मेघवाहन और कुम्भकर्ण द्वारा जिनदीक्षा ग्रहण का प्रसंग कथा का चरम आध्यात्मिक उत्कर्ष रहा।
गुरुदेव ने कहा कि धर्म ही संसार का सार है, और भोगों की लालसा में जीवन का मूल्य खो देना महामोह का परिणाम है। इसी संदर्भ में मंदोदरी, चंद्रनखा और अन्य 48 रानियों द्वारा आर्यिका दीक्षा ग्रहण का प्रसंग विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। कथा का अंतिम हिस्सा राम—सीता मिलन, देवताओं द्वारा सम्मान और भावपूर्ण संवादों से पूर्ण रहा। राम—सीता मिलन में देवताओं की पुष्पवृष्टि, सुगंधित गंधोदक वर्षा और मंगलवाद्य की ध्वनि ने सभा को अत्यंत मंगलमय और भक्तिपूर्ण वातावरण से भर दिया।
सभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भक्ति, करुणा और आनंद के विभिन्न रसों का अनुभव किया। गुरुदेव जयकीर्ति के निर्देशन में पीयूष बज, अनिमेष जैन, महेश गंगवाल, राजेन्द्र पापड़ीवाल, भागचंद लुहाड़िया, पारस पोरवाल सहित समाज के वरिष्ठ गण उपस्थित थे। रामकथा के माध्यम से धर्म, नीति और वैराग्य का संदेश उपस्थित जनसमूह के हृदय में गहराई से अंकित हुआ।

Pratahkal Bureau
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