कोटा। मोशन एजुकेशन के फाउंडर एवं प्रख्यात शिक्षक नितिन विजय ने कहा कि आईआईटी-जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर छात्रों में यह धारणा व्याप्त है कि ये अत्यंत कठिन हैं, किंतु वास्तविकता इससे भिन्न है; ये परीक्षाएं कठिन नहीं बल्कि 'डिफरेंट' यानी अलग हैं। द्रोणा-2 कैम्पस में बुधवार को आयोजित मेगा ओरिएंटेशन प्रोग्राम के दौरान हजारों छात्र-छात्राओं और अभिभावकों को संबोधित करते हुए उन्होंने तैयारी की सटीक रणनीति, मानसिक सुदृढ़ता और अनुशासन के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस भव्य कार्यक्रम में जेईई डिवीजन के ज्वाइंट डायरेक्टर रामरतन द्विवेदी, डिप्टी डायरेक्टर निखिल श्रीवास्तव और नीट डिवीजन के ज्वाइंट डायरेक्टर अमित वर्मा ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने संस्थान की कोचिंग प्रणाली, सफलता के मूल मंत्रों और प्रभावी अध्ययन रणनीतियों की विस्तृत जानकारी प्रदान की।

नितिन विजय ने स्पष्ट किया कि बोर्ड, नीट और जेईई, इन तीनों ही परीक्षाओं की तैयारी के आयाम पूर्णतः भिन्न होते हैं। जहां बोर्ड परीक्षा में थ्योरी और कॉन्सेप्ट की गहन समझ अनिवार्य है, वहीं प्रतियोगी परीक्षाओं में निरंतर अभ्यास, तीव्र गति और सटीकता निर्णायक भूमिका निभाती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि नीट परीक्षा में परीक्षार्थियों को तीन घंटे में 180 प्रश्न हल करने होते हैं, जिसका अर्थ है एक मिनट में एक सवाल; इसके लिए कड़ा अभ्यास और समय प्रबंधन अपरिहार्य है। वहीं जेईई में प्रति प्रश्न समय अधिक मिलता है, परंतु प्रश्नों का बौद्धिक स्तर अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। उन्होंने दो-टूक शब्दों में कहा कि संस्थान किसी के चयन की गारंटी नहीं देता, क्योंकि सफलता का वास्तविक आधार छात्र का स्वयं का संकल्प, एकाग्रता और सतत परिश्रम है। उनके अनुसार मोटिवेशन बाह्य स्रोत से नहीं बल्कि आंतरिक होता है, जो दैनिक लक्ष्यों की पूर्ति और टेस्ट में प्राप्त अच्छे अंकों से ऊर्जा के रूप में जन्म लेता है।

छात्रों को व्यावहारिक परामर्श देते हुए नितिन विजय ने बताया कि शत-प्रतिशत क्लास अटेंडेंस, नियमित समय-सारणी, संक्षिप्त नोट्स का निर्माण और निरंतर पुनरावृत्ति ही सफलता की बुनियाद है। उन्होंने विशेष रूप से पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को हल करने, प्रत्येक टेस्ट में सम्मिलित होने और उनका सूक्ष्म विश्लेषण करने पर बल दिया। उन्होंने छात्रों को प्रेरित किया कि कम अंक आने पर हतोत्साहित होने के बजाय अपनी कमजोरियों को पहचानें और उनमें सुधार करें। उन्होंने सफल व्यक्तियों के साझा गुण का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अपनी कमियों को स्वीकार कर उन पर निरंतर कार्य करते हैं क्योंकि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है। यदि छात्र डटकर परिश्रम करें और अपनी त्रुटियों को सुधार लें, तो सफलता निश्चित है।

मानसिक स्वास्थ्य के प्रति सचेत करते हुए उन्होंने आगाह किया कि मन की शंकाएं और नकारात्मक विचार ‘जूते में फंसे कंकड़’ के समान होते हैं, जो प्रगति के पथ पर बाधक बनते हैं। अतः चिंता के स्थान पर आत्मचिंतन कर समाधान की दिशा में कार्य करना श्रेयस्कर है। छात्र जीवन के संघर्षों पर दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि कई विद्यार्थी टेस्ट में कम अंक आने या हॉस्टल व मेस की छोटी समस्याओं को ही बड़ा दुख मान लेते हैं, जबकि इन तुच्छ बातों में उलझने के बजाय पढ़ाई पर केंद्रित रहना आवश्यक है। उन्होंने सकारात्मक मित्रों के चयन पर जोर दिया जो अध्ययनशील वातावरण निर्मित करें। अंत में, शिक्षकों के साथ संवाद की महत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार चिकित्सक तभी प्रभावी उपचार कर पाता है जब रोगी सटीक लक्षण बताता है, उसी प्रकार शिक्षक भी तभी सहायता कर पाएंगे जब छात्र अपनी समस्या स्पष्ट करेंगे। केवल "नंबर नहीं आ रहे" कहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संबंधित विषय और अध्याय की सटीक कठिनाई बताने पर ही सही मार्गदर्शन संभव है।

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