नरसिंह जयंती: गांधी चौक में 128 वर्षों से जारी है हिरण्यकश्यप वध की परंपरा
अग्रवाल वैष्णव मोमीयां पंचायत द्वारा आयोजित इस उत्सव में 25 फीट ऊंचे पुतले का दहन होगा और भगवान नरसिंह का प्राकट्य उत्सव मनाया जाएगा।

गांधी चौक में नरसिंह जयंती के अवसर पर हिरण्यकश्यप के 25 फीट ऊंचे पुतले को अंतिम रूप देते कलाकार और आयोजन समिति के सदस्य।
भक्ति और शक्ति के संगम का प्रतीक ‘नरसिंह जयंती’ का पर्व गुरुवार को शहर में अपार हर्षोल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाएगा। अग्रवाल वैष्णव मोमीयां पंचायत के तत्वावधान में गांधी चौक में भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार भगवान नृसिंह का प्राकट्य उत्सव आयोजित होगा, जिसमें 25 फीट ऊंचे हिरण्यकश्यप के पुतले का वध कर बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश दिया जाएगा।
संस्था के प्रवक्ता संजय गोयल ने बताया कि कार्यक्रम की शुरुआत सूर्यास्त के समय शाम 6:45 बजे भगवान नरसिंह के प्राकट्य के साथ होगी। इसके तुरंत बाद हिरण्यकश्यप वध का मंचन किया जाएगा, जो आयोजन का प्रमुख आकर्षण रहेगा। कार्यक्रम के अंत में भव्य महाआरती आयोजित होगी तथा उपस्थित श्रद्धालुओं को ठंडाई और विशेष प्रसाद का वितरण किया जाएगा।
संस्था के अध्यक्ष चेतन मित्तल एवं महामंत्री महेंद्र मित्तल ने बताया कि यह ऐतिहासिक समारोह पिछले 128 वर्षों से निरंतर आयोजित हो रहा है। प्राचीन काल में यह आयोजन रामपुरा चौक में होता था, लेकिन वर्ष 1905 में तत्कालीन दरबार द्वारा नरसिंह धर्मशाला के सम्मुख, वर्तमान गांधी चौक में स्थान उपलब्ध कराए जाने के बाद से यह आयोजन यहीं जनसामान्य के लिए नियमित रूप से किया जा रहा है।
महासचिव महेंद्र मित्तल (मठवाले) ने बताया कि हिरण्यकश्यप के पुतले के दहन के बाद श्रद्धालु पुतले के कागज और लकड़ियां अपने साथ घर ले जाते हैं। मान्यता है कि इन्हें घर के मुख्य द्वार पर लगाने से वर्ष भर सुख-शांति बनी रहती है और किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती। इसके अतिरिक्त क्षेत्र की माताएं अपने छोटे बच्चों को भगवान नरसिंह की गोद में बिठाकर आशीर्वाद दिलाती हैं। श्रद्धा है कि इससे बच्चों का भय दूर होता है और वे मौसमी बीमारियों व व्याधियों से सुरक्षित रहते हैं।
समारोह के दौरान राम दरबार, शिवजी, हनुमान और भक्त प्रह्लाद की मनमोहक झांकियां भी सजाई जाएंगी, जो आयोजन को और अधिक आकर्षक बनाएंगी। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत और परंपरा की निरंतरता का भी सशक्त उदाहरण है।

Pratahkal Bureau
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