संपत्ति से बड़ी आत्मा की संपदा, पापास्रव का निरोध ही सच्चा पुरुषार्थ: मुनिश्री योगसागर जी
कोटा में मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि धन-संपत्ति से बड़ी आत्मा की निर्मलता है और पापास्रव का निरोध ही सच्चा पुरुषार्थ है।

तस्वीर में एक श्रद्धालु श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी में जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा के समक्ष शांतिधारा करते हुए नजर आ रहे हैं।
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज ने प्रवचन में बाहरी वैभव और आत्मिक संपदा के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि जीवन में पापास्रव रुक रहा है तो यही सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसके विपरीत पापास्रव निरंतर बढ़ रहा हो तो संसार की कितनी भी संपत्ति प्राप्त कर लेने का वास्तविक लाभ नहीं है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य सामान्यतः धन, प्रतिष्ठा, पद, परिवार, वैभव और सुख-सुविधाओं को अपनी संपत्ति मानता है तथा उनकी वृद्धि के लिए जीवनभर प्रयास करता है, लेकिन आत्मा की निर्मलता को वास्तविक संपदा के रूप में भूल जाता है। धन का होना बुरा नहीं है, लेकिन यदि धन के कारण अहंकार, लोभ, हिंसा, छल-कपट और विषयासक्ति बढ़ने लगे तथा पापास्रव होने लगे तो ऐसी संपत्ति आत्मकल्याण में बाधक बन जाती है। इसके विपरीत रत्नत्रय की आराधना, संयम, सदाचार और पाप से निवृत्ति बढ़ रही है तो यही वास्तविक आध्यात्मिक समृद्धि है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से पूछना चाहिए कि उसकी संपत्ति बढ़ रही है या उसके पाप घट रहे हैं। यदि धन बढ़ रहा है, लेकिन साथ ही क्रोध, मान, माया, लोभ और आसक्ति भी बढ़ रही है तो ऐसी संपत्ति का वास्तविक मूल्य क्या है। इसके विपरीत बाहरी साधन सीमित होने पर भी यदि आत्मा के दोष कम हो रहे हैं, धर्म के प्रति श्रद्धा बढ़ रही है और जीवन पाप से दूर हो रहा है तो यही सच्ची समृद्धि है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को संपत्ति का केवल मालिक बनने के बजाय उसका सदुपयोग करने वाला ट्रस्टी बनना चाहिए। धन प्राप्त हो तो उसका उपयोग धर्म और समाज के हित में हो, वैभव मिले तो विनय बढ़े, प्रतिष्ठा मिले तो अहंकार घटे और जीवन में सुविधाएं बढ़ें तो आत्मचिंतन भी बढ़ना चाहिए। बाहरी संपदा तभी सार्थक है, जब वह आत्मिक संपदा की वृद्धि का माध्यम बने।
मुनिश्री ने कहा कि संसार की संपत्ति क्षणिक है, जबकि आत्मा की संपदा शाश्वत है। इसलिए जीवन का लक्ष्य केवल धन-संचय नहीं, बल्कि पापास्रव का निरोध, आत्मदोषों का क्षय और आत्मा की निर्मलता होना चाहिए। जिस दिन मनुष्य यह समझ लेगा कि पाप से बचना ही सबसे बड़ी कमाई है, उसी दिन उसके जीवन की दिशा बाहरी वैभव से हटकर आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की ओर मुड़ने लगेगी।
महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन शांतिदेवी जी, अभिनंदन सिंघल, श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ, उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती सुजाता पाटिल, गीता कोले एवं समस्त परिवार, महाराष्ट्र द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन अजय जी एवं किरण जी सिंघल परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक प्राप्त किया गया। श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री अनिल जी, दर्शन जी बरमुंडा परिवार को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य बाल ब्रह्मचारिणी ज्योति दीदी के परिवार को प्राप्त हुआ।
आज मंदिर प्रांगण में मातृशक्ति ने डिस्काउंट रेट में राखी की खरीदारी की। मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती सपना जैन द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
मुनिश्री की गुरुवाणी का संदेश रहा कि संपत्ति वह नहीं जो तिजोरी में बढ़े, बल्कि वह है जो आत्मा को निर्मल करे। धन बढ़े तो सेवा बढ़े, वैभव बढ़े तो विनय बढ़े और जीवन में पाप घटे—यही सच्चे पुण्योदय और पुरुषार्थ की पहचान है।

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