श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित पावन चातुर्मास प्रवचनमाला के अंतर्गत परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने सम्यक् ज्ञान, वीतरागता और आत्मसाधना पर आधारित प्रेरणाप्रद प्रवचन दिए। धर्मसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि राग-द्वेष और मोह से रहित सम्यक् ज्ञान ही आत्मा को वास्तविक कल्याण तथा मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करता है।

समिति के निदेशक हुकम जैन 'काका', अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मुनिश्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ अर्जित कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि संपूर्ण मंदिर परिसर जिनवाणी, भक्ति और आत्मचिंतन के पावन वातावरण से गुंजायमान रहा।

धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि सच्चे वीतराग वही हैं, जो राग, द्वेष, मोह और समस्त कषायों से पूर्णतः मुक्त होकर परम ज्योति स्वरूप को प्राप्त करते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य से सम्पन्न सिद्ध परमेष्ठी पंच परमेष्ठी में सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। उनके अनुसार परमेष्ठी का स्वरूप परम ज्योति, श्रेष्ठ ज्योति और सर्वोत्कृष्ट ज्ञान-ज्योति का प्रतीक है तथा यही ज्ञान आत्मा को संसार के अज्ञान से मुक्त कर मोक्ष के शिखर तक पहुंचाता है।

मुनिश्री ने कहा कि ज्ञान कहीं बाहर से लाने, खरीदने या संग्रह करने की वस्तु नहीं है। प्रत्येक जीव की आत्मा में अनंत ज्ञान स्वभावतः विद्यमान है, लेकिन उस पर कर्मों के आवरण पड़े होने के कारण उसका प्रकाश प्रकट नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि वंदना, सम्यक् श्रद्धा, तप, स्वाध्याय और आत्मसाधना के माध्यम से जब इन कर्मावरणों का क्षय होता है, तब आत्मा की ज्ञान-ज्योति प्रकाशित होती है और साधक केवलज्ञान की दिशा में अग्रसर होता है।

उन्होंने कहा कि जिस ज्ञान के साथ राग, द्वेष और अहंकार जुड़ा हुआ हो, वह व्यक्ति के दुःख और बंधन का कारण बनता है। वास्तविक ज्ञान वही है, जो समता, करुणा और वीतरागता का भाव उत्पन्न करे। मुनिश्री ने कहा कि यदि ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी जीवन में विषमता, कषाय, राग-द्वेष और अशांति बनी रहती है, तो ऐसा ज्ञान आत्मकल्याण में सहायक नहीं हो सकता। इसलिए ज्ञान को केवल पढ़ना या सुनना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे जीवन में आत्मसात करना आवश्यक है।

प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने कहा कि विराग का अर्थ केवल संसार का त्याग नहीं, बल्कि राग-द्वेष से पूर्णतः मुक्त होना है। जब आत्मा द्रव्य कर्मों के बंधन से मुक्त होकर अपने शुद्ध, निर्मल और स्वाभाविक स्वरूप में स्थित होती है, तभी उसे विमल अवस्था की प्राप्ति होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे आत्मचिंतन, संयम और समता के माध्यम से अपने भीतर छिपी दिव्य ज्ञान-ज्योति को प्रकट करने का सतत पुरुषार्थ करें। उन्होंने इसे भगवान महावीर की वीतराग वाणी का सार और आत्मकल्याण का शाश्वत मार्ग बताया।

चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ पूजन, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी श्रवण एवं धर्माराधना कर पुण्य अर्जित किया। मुनिश्री के आध्यात्मिक और जीवनोपयोगी संदेशों ने उपस्थित समाजजनों को आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।

समिति अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती पारुल देवी (दिल्ली), डॉ. विमल गादिया, श्रीमती विजयलता (गुरुग्राम) तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

निदेशक हुकम जैन 'काका' ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती पारुल देवी (दिल्ली) परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ।

महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल एवं सुनील माडिया ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन डॉ. विमल गादिया परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी के आहारदान का सौभाग्य जम्बू जी, ओमप्रकाश जी एवं भानु आवां परिवार को तथा क्षुल्लक श्री संयम सागर जी के आहारदान का सौभाग्य राजेन्द्र जी, हुकम जैन 'काका' एवं प्रकाश हरसोरा परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्री मनीष जैन (आर.के. पुरम) द्वारा सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव से आचार्यश्री की पूजन-अर्चना एवं अर्घ्य समर्पण कर धर्मलाभ अर्जित किया।

प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने कहा कि राग-द्वेष से रहित सम्यक् ज्ञान ही आत्मकल्याण का वास्तविक आधार है। उन्होंने कहा कि ज्ञान बाहर से प्राप्त नहीं होता, बल्कि वह प्रत्येक आत्मा का स्वाभाविक गुण है। कर्मावरण हटते ही आत्मा की ज्ञान-ज्योति स्वयं प्रकाशित हो जाती है। उनके अनुसार समता, वीतरागता और आत्मचिंतन ही ज्ञान की वास्तविक सार्थकता हैं। उन्होंने कहा कि विराग का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि राग-द्वेष से मुक्त होना है तथा तप, स्वाध्याय, वंदना और सम्यक् श्रद्धा के माध्यम से ही आत्मा केवलज्ञान और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होती है।

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