कोटा, 2 नवंबर 2026, सोमवार। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन में दान की शुद्धता, आहारदान में विवेक और सल्लेखना (समाधिमरण) के आध्यात्मिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान की सार्थकता केवल वस्तु देने में नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनय, पात्र के प्रति आदर और सम्यक ज्ञान-विवेक के भाव में निहित है। इसी प्रकार सल्लेखना कषायों के त्याग और आत्मकल्याण की साधना का मार्ग है।

मुनि श्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 121 एवं 122 की व्याख्या करते हुए दान के अतिचारों और धार्मिक क्रियाओं में शुद्ध आचरण का महत्व समझाया। श्लोक 121 की व्याख्या में उन्होंने बताया कि आहार आदि वस्तुओं को हरे पत्तों या पुष्पों से ढककर देना, दान की विधि में अनादर अथवा विस्मरण करना, ईर्ष्या भाव रखना, दान की प्रक्रिया में त्रुटि करना तथा दूसरे दानदाताओं की प्रशंसा सहन नहीं होने पर ईर्ष्यावश दान या पूजा करना दान के पांच अतिचार हैं।

उन्होंने कहा कि आहारदान करते समय सचित-अचित का विवेक रखने के साथ शुद्धता और मर्यादा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। फल-सब्जियों के उपयोग में भी जीवों की रक्षा के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है। मुनि श्री ने बताया कि भूमि-कंद में जीवों की उत्पत्ति सर्वाधिक होती है। हरी वनस्पतियों और बहुबीज फल-सब्जियों के उपयोग में आगम के अनुसार विवेक रखना चाहिए। वर्तमान समय में कोल्ड स्टोरेज में लंबे समय तक रखे जाने वाले फल-सब्जियों के उपयोग के प्रति भी सावधानी और मर्यादा का भाव जरूरी है।

महाराज श्री ने स्पष्ट किया कि आहारदान केवल वस्तु देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि श्रद्धा, विनय, नवधा भक्ति और सम्यक ज्ञान-विवेक के साथ पात्र के प्रति आदर व्यक्त करने का माध्यम है। जिस दान में ज्ञान, विवेक और श्रद्धा के भाव जुड़े होते हैं, वही वास्तव में फलदायी होता है।

सल्लेखना शरीर नहीं, कषायों के त्याग की साधना है

श्लोक क्रमांक 122 की व्याख्या करते हुए मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने सल्लेखना अथवा समाधिमरण के आध्यात्मिक स्वरूप को समझाया। उन्होंने बताया कि असाध्य रोग, अत्यंत वृद्धावस्था, दुर्भिक्ष अथवा आकस्मिक उपसर्ग जैसी विषम परिस्थितियों में रत्नत्रय धर्म की आराधना करते हुए कषायों को धीरे-धीरे क्षीण करना और विधिपूर्वक शरीर के प्रति मोह का त्याग करना सल्लेखना कहलाता है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य, देव, तिर्यंच अथवा प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न उपसर्गों तथा शरीर की असमर्थता की स्थिति में धर्म की रक्षा और आत्मकल्याण की भावना से समाधिमरण का मार्ग अपनाया जाता है।

मुनि श्री ने स्पष्ट किया कि सल्लेखना का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि समता और संयमपूर्वक कषायों का त्याग करते हुए आत्मकल्याण की भावना को दृढ़ करना है। यह सम्यक श्रद्धा, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र के प्रति निष्ठा का मार्ग है। उन्होंने कहा कि आत्मा अजर-अमर और अविनाशी है, जबकि शरीर परिवर्तनशील है। इसलिए शरीर के प्रति अत्यधिक मोह छोड़कर आत्मस्वरूप की पहचान करना ही सच्ची साधना है।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने कहा कि दान हो या तप, पूजा हो या समाधिमरण, प्रत्येक धार्मिक क्रिया का वास्तविक उद्देश्य राग-द्वेष का त्याग, कर्म निर्जरा और आत्मशुद्धि होना चाहिए। जीवन में प्रत्येक कार्य ज्ञान और विवेकपूर्वक करने पर ही धर्माचरण सार्थक बनता है।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ प्रेमलता, राकेश, संजय एवं उमेश पाटोदी परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।

सुमित सेंकी एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार, महावीर, श्रीमती भारती एवं सिद्धार्थ मित्तल परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया।

भक्तामर विधान में महावीर, श्रीमती भारती एवं सिद्धार्थ मित्तल परिवार ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ प्रेम प्रभा एवं निर्मला जैन, बूंदी को प्राप्त हुआ, वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवास को प्राप्त हुआ।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए तथा जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

गुरुवाणी के अमृत संदेश में मुनि श्री ने बताया कि दान की सार्थकता वस्तु की मात्रा में नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनय, पात्र के प्रति आदर और विवेक में है। सच्चा धर्म वही है जो कषायों को घटाए और आत्मा को शुद्ध बनाए।

स्वास्थ्य संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि शरीर धर्मसाधना का साधन है। इसकी क्षमता और मर्यादा को समझते हुए संयमित आहार-विहार, उचित देखभाल और संतुलित जीवनचर्या अपनानी चाहिए। वहीं धर्मसाधना का मूल संदेश देते हुए उन्होंने सल्लेखना को शरीर के प्रति मोह घटाने, कषायों का त्याग करने और जीवन के अंतिम क्षण तक समता, संयम एवं रत्नत्रय धर्म में दृढ़ रहने की साधना बताया।

Bhagvati Medatwal, Kota

Bhagvati Medatwal, Kota

नाम: भगवती मेड़तवाल

वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)

कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र

बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय

परिचय 

भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।

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