कोटा। धर्मनगरी कोटा के केंद्रबिंदु श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र दादाबाड़ी नसियां जी में चातुर्मास कर रहे पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने सम्यग्दर्शन के आठ अंगों में पांचवें उपगूहन अंग का आध्यात्मिक महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि उपगूहन का अर्थ दूसरों के दोषों को छिपाना और उन्हें सन्मार्ग पर लगाने का प्रयास करना है।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि हमें दूसरों के दोषों को उजागर करने या उनकी निंदा करने के बजाय उनके दोषों को छिपाकर उन्हें सही मार्ग पर लाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि कोई व्यक्ति अपने मार्ग से भ्रमित न हो। उन्होंने कहा कि यदि दोष देखने हैं तो सबसे पहले अपने भीतर के दोषों को देखें और उन्हें दूर करने का प्रयास करें। आत्मनिरीक्षण और आत्मसुधार ही व्यक्ति के जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।

मुनि श्री ने अनेक उदाहरणों के माध्यम से निंदा से होने वाली हानि को समझाया। उन्होंने कहा कि जो लोग दूसरों की निंदा करते हैं, वे अधोगति की ओर जाते हैं और उन्हें नीच गोत्र कर्म का बंध होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल दूसरों की निंदा ही नहीं, बल्कि स्वयं की प्रशंसा करना भी अधोगति का कारण बनता है। उन्होंने बताया कि आचार्य उमास्वामी ने अपने ग्रंथ तत्त्वार्थ सूत्र में भी इस तथ्य को स्पष्ट किया है।

कार्यक्रम में श्री हुकुम जी काका, महावीर जी मित्तल एवं ठोरा जी परिवार द्वारा चित्र अनावरण, दीप प्रज्ज्वलन एवं शास्त्र भेंट की गई। इसके पश्चात आचार्य भगवान विद्यासागर जी महाराज की पूजन विधि-विधान से संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ पूजन-अर्चना में सहभागिता की तथा मुनि श्री योगसागर जी महाराज के मंगल प्रवचनों का श्रवण कर धर्मलाभ लिया।

मुनि श्री के प्रवचन में उपगूहन अंग के माध्यम से दूसरों के दोषों को छिपाकर उन्हें सन्मार्ग पर लगाने, निंदा से बचने और अपने दोषों को पहचानकर आत्मसुधार करने का संदेश दिया गया।

Pratahkal Newsroom

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