संलेखना और समाधि मरण आत्मकल्याण की श्रेष्ठ साधना, मुनि योगसागर जी ने बताया महत्व
कोटा में मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक 123 से 125 की व्याख्या में संलेखना और समाधि मरण का महत्व बताया। प्रवचनों में क्षमा, वैराग्य, कषाय त्याग, महाव्रत और आत्मचिंतन का संदेश दिया।

कोटा में आयोजित धर्मसभा के दौरान आचार्य श्री के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर प्रणाम करते राजेश मंगलम एवं उनका परिवार।
कोटा, 3 नवंबर 2026। जीवन की सार्थकता केवल संयम और साधना के साथ जीने में ही नहीं, बल्कि अंतिम समय में राग-द्वेष, मोह और कषायों का त्याग कर समभाव बनाए रखने में भी है। परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने मंगलवार को रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 123, 124 एवं 125 की व्याख्या करते हुए संलेखना और समाधि मरण को आत्मकल्याण की श्रेष्ठ साधना बताया। उन्होंने कहा कि जीवन के प्रारंभ की गरिमा तभी सार्थक होती है, जब उसका उपसंहार भी संयम, विवेक और आत्मचिंतन के साथ हो। इसलिए जीवन के अंतिम समय को विशेष सावधानी, जागरूकता और समभाव के साथ व्यतीत करना चाहिए।
महाराज श्री ने कहा कि तपश्चर्या का वास्तविक फल अंतिम समय के परिणामों पर निर्भर करता है। संलेखना का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि राग, द्वेष, मोह और कषायों को क्रमशः क्षीण करते हुए शुद्ध आत्मस्वरूप की ओर अग्रसर होना है। पर पदार्थों को प्राप्त करने की कामना ही संसार है, जबकि आत्मतत्त्व को प्राप्त करने की भावना संलेखना अथवा समाधि मरण का आधार है।
उन्होंने शरीर को वस्त्र के समान मानते हुए आत्मा को उससे भिन्न अनुभव करने की साधना को भेदविज्ञान बताया। महाराज श्री के अनुसार, समाधि का अर्थ समभाव के साथ अंतर्मुखी होकर अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित होना है।
महाराज श्री ने कहा कि जीवनभर संयम का पालन करने के साथ अंतिम समय में भी पांच महाव्रतों की भावना धारण करना आवश्यक है। समाधि के मार्ग में मानसिक विकल्प, शारीरिक व्याधियां, सांसारिक उपाधियां और मोह-ममता बाधक बनती हैं। इनसे मुक्त होकर सभी के प्रति ममत्व का त्याग करना और शुद्ध, शाश्वत एवं निर्विकल्प आत्मतत्त्व का अनुभव करना ही साधना का लक्ष्य है। साधक अपनी शारीरिक परिस्थितियों और सामर्थ्य के अनुरूप विधिपूर्वक संलेखना धारण करता है। इसमें आहार-विहार और कषायों का क्रमशः परिमार्जन करते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
श्लोक क्रमांक 124 की व्याख्या करते हुए महाराज श्री ने संलेखना धारण करने वाले साधक की विधि समझाई। उन्होंने कहा कि साधक को राग, द्वेष और मोह का त्याग कर अपने हृदय को निर्मल बनाना चाहिए। परिजनों और परिवार के सदस्यों से मधुर वचनों में हृदयपूर्वक क्षमा मांगनी चाहिए तथा स्वयं भी सभी को क्षमा करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि क्षमा और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन के सभी वैर-विरोध समाप्त कर आत्मा की ओर उन्मुख होना चाहिए। जन्म और मरण शरीर के साथ जुड़े हैं तथा संसार निरंतर परिवर्तनशील है। इसलिए प्रत्येक क्षण अपने परिणामों की समीक्षा करते रहना आवश्यक है। मोह के कारण मनुष्य पर पदार्थों में उलझा रहता है और अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान नहीं पाता। मोह एवं सांसारिक प्रीति का त्याग कर स्वयं की ओर अंतर्मुखी होना ही महान साधना है।
श्लोक क्रमांक 125 में समाधि के लिए आलोचनापूर्वक महाव्रत धारण करने का उपदेश देते हुए महाराज श्री ने कहा कि संलेखना धारण करने वाले साधक को जीवन में किए गए समस्त पापों और दुष्कृत्यों की निष्कपट भाव से आलोचना करनी चाहिए। मन, वचन और काय से स्वयं किए गए, दूसरों से कराए गए तथा अनुमोदित किए गए पापकर्मों की समीक्षा कर उनके प्रति पश्चाताप का भाव रखना चाहिए। जीवन के अंतिम समय में पांचों महाव्रतों को उल्लासपूर्वक धारण करने की भावना भी रखनी चाहिए।
महाराज श्री ने विशेष रूप से कहा कि समाधि मरण मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि जीवनभर की संयम साधना का उत्कृष्ट परिणाम है। आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर भाव करना, कषायों को क्षीण करना और पर पदार्थों से ममत्व छोड़ना ही संलेखना का वास्तविक उद्देश्य है। मनुष्य जीवन आत्मकल्याण का दुर्लभ अवसर है, इसलिए प्रत्येक श्रावक को अपने जीवन में संयम, क्षमा, त्याग और आत्मचिंतन को स्थान देना चाहिए। उनके मंगल प्रवचनों से धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, वैराग्य, क्षमा और संयममय जीवन की प्रेरणा मिली।
आज के प्रमुख पुण्यार्जक
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ राजेश मंगलम परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन हुकम गुडमाला प्रवीन शिखा बगडा परिवार, प्रवीण, बाबूलाल नरेश नेहरू वाले, केकड़ी परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया।
भक्तामर विधान में सुशीला शेलेश अंशुल गोधा परिवार ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ ब्रह्मचारिणी दीदी कमल को प्राप्त हुआ, जबकि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य दीपचंद धनोप्या को मिला।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

Bhagvati Medatwal, Kota
नाम: भगवती मेड़तवाल
वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)
कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र
बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय
परिचय
भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।
