अनर्थदंड व्रत: कोटा में मुनि योगसागर जी ने बताए संयम के मार्ग
मुनि योगसागर ने कोटा में रत्नकरण्ड श्रावकाचार के प्रवचन में अपध्यान, दुश्रुति और प्रमादचर्या को संयम में बाधा बताया।

कोटा के पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में प्रवचन देते मुनि योगसागर जी महाराज.
कोटा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने अपध्यान, दु:श्रुति और प्रमादचर्या को आत्मकल्याण एवं संयम के मार्ग में प्रमुख बाधाएं बताते हुए अनर्थदंड व्रत के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि अनावश्यक हिंसा, अशुभ चिंतन और निरर्थक प्रवृत्तियों से बचकर ही व्यक्ति अपने जीवन में आत्मसंयम, विवेक और आध्यात्मिक विकास को स्थान दे सकता है। शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को आश्विन शुक्ल पक्ष षष्ठी के अवसर पर पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित रत्नकरण्ड श्रावकाचार की प्रवचनमाला में मुनि श्री ने श्लोक 79, 80 एवं 81 की विस्तृत व्याख्या की।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि अपध्यान, दु:श्रुति, प्रमादचर्या तथा मन-वचन-काय की अनावश्यक प्रवृत्तियां आत्मकल्याण और संयम के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती हैं। जीवन में विवेक, स्वाध्याय और आत्मनियंत्रण अपनाकर ही व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में आगे बढ़ सकता है। उन्होंने प्रेरणा दी कि मनुष्य को ऐसे साहित्य, दृश्यों और श्रवण से बचना चाहिए, जो मन में अशुभ विचार उत्पन्न करते हैं और वैराग्य तथा सदाचार के भावों को कमजोर करते हैं।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक संयमी, व्रती और त्यागी को अखबार, टीवी एवं मोबाइल जैसे माध्यमों के अनावश्यक उपयोग से दूरी बनाकर जिनागम के प्रथमानुयोग तथा वैराग्यवर्धक आध्यात्मिक साहित्य के स्वाध्याय में समय लगाना चाहिए। स्वाध्याय का उद्देश्य केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन में व्रत, नियम, त्याग और संयम के भाव जागृत करना है। यदि अध्ययन और श्रवण के बाद भी वैराग्य एवं आत्मशुद्धि के भाव उत्पन्न नहीं होते, तो व्यक्ति को अपने चिंतन और आचरण का आत्मावलोकन करना चाहिए।
अनर्थदंड व्रत की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने श्लोक 80 के माध्यम से बताया कि बिना प्रयोजन भूमि खोदना, जल बहाना, अग्नि जलाना, हवा करना, वनस्पति तोड़ना तथा व्यर्थ में इधर-उधर घूमना अनर्थदंड के विभिन्न रूप हैं। ऐसी गतिविधियां, जिनसे कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होता और जीवों को कष्ट पहुंचने की संभावना रहती है, उनसे बचना श्रावक के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जीवन में बढ़ती अशांति और अनेक समस्याओं के कारणों को पहचानकर अनावश्यक प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना चाहिए।
मुनि श्री ने प्रकृति के अनुकूल खान-पान, रहन-सहन, पहनावे और आवास के महत्व पर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने जीवनशैली में विवेकपूर्ण बदलाव अपनाने, अनावश्यक उपभोग से बचने और संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक स्वरूप केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में अहिंसा, सावधानी और आत्मसंयम का पालन करना भी धर्मसाधना का महत्वपूर्ण अंग है।
प्रवचनमाला में श्लोक 81 की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने अनर्थदंड व्रत के अतिचारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने अनावश्यक अभद्र वचन, निरर्थक बकवास, मन-वचन-काय की अनुचित प्रवृत्तियों तथा आवश्यकता से अधिक सामग्री का संग्रह करने से बचने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि वाणी का उपयोग सद्विचारों के आदान-प्रदान और हितकारी संवाद के लिए होना चाहिए। व्यर्थ की चर्चा, अशुभ चिंतन और निरुद्देश्य गतिविधियां व्यक्ति की मानसिक शांति को प्रभावित करती हैं तथा आध्यात्मिक उन्नति में बाधक बनती हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने विचारों पर नियंत्रण रखते हुए मन को शुभ उपयोग में लगाना चाहिए। आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच अंतर समझकर परिग्रह की मर्यादा निर्धारित करना भी संयम का महत्वपूर्ण अंग है। अनर्थदंड व्रत का पालन अनावश्यक पाप प्रवृत्तियों से बचने, आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने तथा पुण्यवृद्धि के भाव विकसित करने का अवसर प्रदान करता है। मुनि श्री ने प्रत्येक श्रावक से जीवन में विवेक, स्वाध्याय, मर्यादित व्यवहार और संयम को स्थान देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि निरर्थक प्रवृत्तियों का त्याग कर समय, विचार और सामर्थ्य का सदुपयोग करना आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक कदम है।
पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ सिद्धार्थ जी-रैना जी तथा श्रेयांस जी-प्रियंका हरसोरा ने प्राप्त किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने अर्जित किया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेन्द्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; कमलेश, अशोक एवं संदीप गोयल परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने किया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में श्रीमान सुरेन्द्र एवं कपिल जैन ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ कमलेश जी, अशोक जी एवं संदीप जी गोयल परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य त्रिलोक जी एवं रेखा जी लुहाड़िया परिवार को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर अंकिता को प्राप्त हुआ।

Bhagvati Medatwal, Kota
नाम: भगवती मेड़तवाल
वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)
कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र
बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय
परिचय
भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।
