मातृ दिवस विशेष: ममता की गहराई और संस्कारों की अनमोल धरोहर पर एक लेख
दीक्षा शर्मा द्वारा रचित यह लेख मातृ दिवस के अवसर पर परिवार में मां की अपरिहार्यता, उनके निस्वार्थ प्रेम और बच्चों के चरित्र निर्माण में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है।

मातृ दिवस के उपलक्ष्य में मां की ममता और बच्चों के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता एक प्रतीकात्मक चित्र।
सृष्टि की सबसे सुंदर रचना और निस्वार्थ प्रेम का पर्याय 'मां' के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु मातृ दिवस एक विशेष अवसर बनकर उभरा है। इस पावन दिवस पर मां की महिमा का गुणगान करते हुए यह तथ्य स्पष्ट होता है कि मां के समान इस संसार में कोई दूसरा विकल्प नहीं है; मां केवल मां ही होती है। वे परिवार अत्यंत भाग्यशाली हैं जिनके आंगन में मां की उपस्थिति एक सुरक्षा कवच की भांति विद्यमान है। 'मां' शब्द भले ही उच्चारण में सबसे छोटा प्रतीत हो, परंतु इसकी ममता की गहराई समुद्र के विस्तार को भी पीछे छोड़ देती है, जिसमें स्नेह, तपस्या, सहनशीलता और बच्चों के प्रति अपार प्रेम जैसे बहुमूल्य रत्न समाहित हैं। वह न केवल खुशियों का आधार और सपनों का संसार है, बल्कि इस धरा पर मानवीय संवेदनाओं की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति भी है।
प्रभु की अद्भुत सृष्टि में विशिष्ट स्थान प्राप्त मां की तुलना किसी भी अन्य शक्ति से संभव नहीं है। बच्चों को अपने रक्त से सींचकर जीवन देने वाली मां ही व्यक्तित्व का सृजन और निर्माण करती है, जो उन्हें संस्कारों की अटूट धरोहर सौंपती है। वह अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए निरंतर चिंतित रहती है और उन्हें आदर्श मूल्यों में ढलना सिखाती है। संस्कारों की चर्चा में मां का नाम सदैव अग्रणी रहता है, क्योंकि वह बच्चों के हित में नारियल की भांति बाहर से कठोर और भीतर से अत्यंत कोमल अनुशासन का परिचय देती है। अपने समस्त कर्तव्यों, जैसे बच्चों का लालन-पालन और दिनचर्या का प्रबंधन, वह पूरी निष्ठा से निभाती है।
पारिवारिक ढांचे में पिता का योगदान यदि आकाश के समान है, तो मां का स्थान पृथ्वी की भांति सुदृढ़ और धैर्यवान है। जहां पिता घर की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु बाहरी श्रम करते हैं, वहीं मां बच्चों के जीवन को संवारने में अपना सर्वस्व अर्पित कर देती है। आधुनिक युग में कामकाजी माताएं दोहरी जिम्मेदारियां निभाते हुए घर की साफ-सफाई, बच्चों की देखभाल और रसोई के प्रबंध में सुबह से शाम तक समर्पित रहती हैं। रसोई से उठने वाली व्यंजनों की महक और घर के मंदिर में गूंजती आरती की घंटियां मां की कर्तव्य परायणता का ही प्रमाण हैं। एक संतान को मां के आंचल में जो आत्मीय सुकून प्राप्त होता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। निस्वार्थ भाव से ईश्वर से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करने वाली मां वास्तव में जीवन, आशा और स्नेह का संगम है। अंततः मां के बिना यह संसार और जीवन दोनों ही अधूरे हैं, और इस सत्य की पूर्ण अनुभूति व्यक्ति को तब होती है जब वह स्वयं माता-पिता की भूमिका में आता है। दीक्षा शर्मा, धर्मपत्नी अरविंद शर्मा द्वारा प्रस्तुत यह विचार मां की अपरिहार्यता को रेखांकित करते हैं

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