उत्तम क्षमावाणी पर्व पर मुनि योगसागर बोले, क्षमा से होती है आत्मशुद्धि और वैर का अंत
कोटा के नसियां जी, दादाबाड़ी में उत्तम क्षमावाणी पर्व पर मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने आत्मशुद्धि और क्षमा का संदेश दिया। सामूहिक क्षमावाणी के साथ दशलक्षण महापर्व के तपस्वियों का सम्मान किया गया।

तस्वीर में कोटा के नसियां जी स्थित दादाबाड़ी में उत्तम क्षमावाणी पर्व के अवसर पर तपस्वियों और साधकों का सम्मान करते हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
कोटा, 27 सितम्बर 2026। पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व की साधना के समापन के बाद रविवार को उत्तम क्षमावाणी पर्व श्रद्धा, आत्मचिंतन और परस्पर क्षमा-याचना के साथ मनाया गया। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा को ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने संबोधित किया।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि क्षमावाणी केवल औपचारिक रूप से एक-दूसरे से क्षमा मांगने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर झांकने और क्रोध, मान, माया तथा लोभ जैसी कषायों को पहचानकर उन्हें शांत करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने वाला छोटा नहीं होता और क्षमा करने वाला बड़ा नहीं होता। दोनों ही आत्मा की शुद्धि की दिशा में आगे बढ़ते हैं। जीवन में सबसे बड़ी विजय किसी दूसरे को पराजित करने की नहीं, बल्कि अपने क्रोध और कषायों को जीतने की है। जब तक मन में क्रोध की अग्नि जलती रहती है, तब तक बाहरी संबंधों में वास्तविक शांति स्थापित नहीं हो सकती। क्षमावाणी का वास्तविक अर्थ मन से वैर-विरोध का त्याग कर आत्मा में मैत्रीभाव स्थापित करना है।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार की स्वाध्याय श्रृंखला के माध्यम से श्रावक के आचरण को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है। धर्म का प्रभाव मन, वचन और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। श्रावक को हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील तथा परिग्रह जैसे स्थूल पापों से विरत होकर अपने जीवन को संयमित बनाना चाहिए।
उन्होंने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 52 का उल्लेख करते हुए बताया कि अणुव्रतों में स्थूल हिंसा, स्थूल असत्य, स्थूल चोरी, स्थूल अब्रह्म और स्थूल परिग्रह से विरति को प्रमुख आधार माना गया है। मुनिश्री ने कहा कि अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव की हत्या न करना ही नहीं है, बल्कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा, संवेदना और मैत्री का भाव रखना भी अहिंसा की साधना है। हमारे व्यवहार से किसी जीव को अनावश्यक पीड़ा न पहुंचे, इसके प्रति सजग रहना ही श्रावक के जीवन की वास्तविक धर्म-साधना है।
मुनिश्री ने कहा कि ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ केवल बोलने के लिए शब्द नहीं, बल्कि आत्मावलोकन का संकल्प है। वर्षभर में मन, वचन और काय से जाने-अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा मांगते हुए यह संकल्प भी लेना चाहिए कि भविष्य में हमारे कारण किसी जीव को कष्ट न पहुंचे और हमारे व्यवहार से किसी के हृदय को ठेस न लगे। उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति के प्रति मन में राग-द्वेष, शिकायत या कटुता है, तो क्षमावाणी के अवसर पर उसे समाप्त कर देना चाहिए। क्षमा का भाव तभी सार्थक होगा, जब हम स्वयं भी दूसरों की भूलों को हृदय से क्षमा करने की भावना रखें।
धर्मसभा के समापन अवसर पर सामूहिक क्षमावाणी कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे के प्रति वर्षभर में मन, वचन और काय से हुई ज्ञात-अज्ञात भूलों के लिए क्षमा-याचना की। सामूहिक रूप से ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ का उच्चारण करते हुए सभी ने परस्पर मैत्री, सद्भाव और क्षमा का भाव रखने का संकल्प लिया। श्रद्धालुओं ने कहा कि क्षमावाणी केवल एक दिन का आयोजन न रहकर जीवन के व्यवहार का हिस्सा बने, यही इस पर्व की वास्तविक सार्थकता है।
दशलक्षण महापर्व के दौरान कठिन तप-साधना करने वाले तपस्वियों का भी समारोह में सम्मान किया गया। 10 उपवास, 5 उपवास, 3 उपवास तथा सोलह कारण जी के उपवास करने वाले साधकों का माल्यार्पण कर एवं शॉल ओढ़ाकर स्वागत-सम्मान किया गया। तपस्वियों के सम्मान के दौरान धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने उनका अभिनंदन किया और तप-साधना के प्रति श्रद्धा एवं अनुमोदना व्यक्त की। इस अवसर पर धर्मसभा में तपस्वियों के प्रति सम्मान, भक्ति और अनुमोदना का वातावरण रहा।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि क्षमा से संबंध सुधरते हैं, क्रोध शांत होता है, वैर समाप्त होता है और आत्मा हल्की होती है। इसलिए उत्तम क्षमा का यह पर्व केवल दूसरों से क्षमा मांगने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्वयं के भीतर परिवर्तन लाने का माध्यम बनना चाहिए। धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने उत्तम क्षमा के भाव को जीवन में उतारने तथा मन, वचन और कर्म से किसी को ठेस न पहुंचाने का संकल्प लिया। सामूहिक क्षमावाणी के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की सपरिवार पूजनकर्ता परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किए गए। इसमें राजेश जी, श्रीमती अनिता जी, हिमांशु, डॉ. नेहा पाटोदी, भागचंद, चंद्र प्रकाश, संजय, अजय गिरनार, कबीर एवं समस्त जैन गोयल परिवार शामिल रहे। कलश स्थापना का पुण्यार्जन भी श्रद्धालु परिवार द्वारा किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेंद्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमती विमला जी, धनराज एवं संतोष जेठानीवाल परिवार; जम्बू जैन अध्यक्ष, श्रीमती अर्चना एवं दिव्यांश-मुस्कान दुगेरिया परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया। श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ कमलेश जी सोगानी को प्राप्त हुआ। यह आहारदान धर्मचंद जी, हेमलता जी एवं दीक्षा जी धनोप्या द्वारा सम्पन्न कराया गया।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य धनराज-संजय जी पानी परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

Bhagvati Medatwal, Kota
नाम: भगवती मेड़तवाल
वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)
कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र
बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय
परिचय
भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।
शैक्षणिक योग्यता (Education)
उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।
