संस्कारों की शुद्धि से बदलेगा जीवन, सम्यक दृष्टि मोक्ष का प्रथम द्वार: मुनि योगसागर
कोटा नसियां जी में सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिन मुनि योगसागर जी ने संस्कार, सम्यक दृष्टि और मोक्षमार्ग का संदेश दिया।

तस्वीर में कोटा के जैन मंदिर में मुनि योगसागर जी महाराज के सान्निध्य में शांतिधारा एवं धार्मिक अनुष्ठान करते हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं
कोटा के श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी, दादाबाड़ी में अष्टान्हिका महापर्व एवं नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव के तृतीय दिवस श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का विशेष वातावरण देखने को मिला। निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर विधान, अभिषेक, पूजन और अर्घ्य समर्पण कर आत्मशुद्धि, विश्वशांति एवं समस्त जीवों के मंगल की कामना की।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र के निदेशक हुकम जैन 'काका' ने बताया कि तृतीय दिवस प्रातःकाल मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ सिद्धचक्र महामंडल विधान सम्पन्न हुआ। इसमें महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने श्रद्धा और भक्ति के साथ सहभागिता कर आत्मकल्याण का पुण्य अर्जित किया। मंदिर परिसर पूरे दिन णमोकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिभाव की मंगलध्वनि से गुंजायमान रहा।
विधान समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने संस्कार, सम्यक दर्शन और आत्मकल्याण पर आधारित प्रवचन दिए। मुनिश्री ने कहा कि जीव अपने कर्मों और संस्कारों के अनुसार अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। यदि मनुष्य अपने परिणामों का आत्मनिरीक्षण कर सम्यक दृष्टि, सदाचार और धर्ममय जीवन को अपनाता है तो उसके लिए मोक्षमार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि संसार में अनंत जीव हैं, लेकिन प्रत्येक जीव के संस्कार, भाव और परिणाम अलग-अलग होते हैं। मनुष्य को यह समझना चाहिए कि मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, श्रावकत्व और श्रमणत्व आत्मा की आध्यात्मिक यात्रा के चार महत्वपूर्ण सोपान हैं। मिथ्या दृष्टि वाला व्यक्ति सत्य और असत्य का विवेक खो देता है, जबकि सम्यक दृष्टि से युक्त व्यक्ति धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन का उदाहरण देते हुए मुनिश्री ने कहा कि श्रीराम और रावण का युद्ध व्यक्तिगत प्रतिशोध का नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, वचन और मर्यादा की रक्षा का युद्ध था। सम्यक दृष्टि कभी हिंसा का समर्थन नहीं करती, बल्कि धर्म और न्याय की स्थापना के लिए आवश्यक कर्तव्य पालन का मार्ग दिखाती है।
उन्होंने कहा कि श्रावक का जीवन त्याग, संयम और सदाचार की ओर बढ़ता है, जबकि श्रमण अवस्था में 'न तेरा, न मेरा' का भाव पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है। मनुष्य जीवन भोग-विलास के लिए नहीं, बल्कि कर्मों के क्षय, आत्मशुद्धि और आत्मोन्नति के लिए प्राप्त हुआ है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि अष्टान्हिका महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पर्व नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, विवेक, सद्भाव और संस्कारों के परिष्कार का महापर्व है। यदि मनुष्य अपने भीतर के दोषों का त्याग कर सद्गुणों को धारण कर ले तो उसका जीवन मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो जाता है।
समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि क्षुल्लक संयम सागर जी महाराज ने अपने प्रेरक प्रवचनों में कहा कि मनुष्य के सामने अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के संस्कार हमेशा मौजूद रहते हैं। बुरे संस्कार जीव को संसार के बंधनों में उलझाते हैं, जबकि संतों का सान्निध्य और धर्म का मार्ग आत्ममुक्ति की दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सदाचार, संयम, धर्म और आत्मानुशासन को अपनाना ही सच्ची साधना है। प्रवचन के दौरान उन्होंने सल्लेखना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सल्लेखना केवल मृत्यु का व्रत नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन की साधना का सर्वोच्च संस्कार है। सल्लेखना का अधिकारी बनने के लिए व्रत, संयम, प्रतिमाओं का पालन और निरंतर आत्मशुद्धि आवश्यक है। मृत्यु का समय किसी को ज्ञात नहीं होता, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को आज से ही अपने अंतिम क्षणों को मंगलमय बनाने की तैयारी प्रारंभ कर देनी चाहिए।
मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के तृतीय दिवस 64 ऋद्धियों के अर्घ्य श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ समर्पित किए गए। श्रद्धालुओं ने विधिवत अभिषेक, पूजन, अर्घ्य समर्पण और मंगल आरती में भाग लेकर धर्मलाभ अर्जित किया। पूरे मंदिर परिसर में णमोकार महामंत्र, जैन भक्ति गीतों और जयघोष की गूंज रही। विधान के माध्यम से विश्वशांति, आत्मकल्याण और समस्त जीवों के मंगल की कामना की गई।
समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि तृतीय दिवस की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा नेहल जी के जन्मदिवस के पावन अवसर पर प्राप्त किया गया। इसके साथ ही श्री सन्नी जी बगड़ा तथा श्री राजेन्द्र जी, श्री हुकम जी 'काका' हरसोरा परिवार भी पुण्यार्जन में सहभागी बने।
भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री सन्नी जी बगड़ा द्वारा प्राप्त किया गया। वहीं श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन नेहल जी एवं सन्नी जी द्वारा श्रद्धा और भक्तिभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।
सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिन मुनि योगसागर जी महाराज के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को संस्कारों के परिष्कार, सम्यक दृष्टि और आत्मचिंतन का संदेश दिया। आयोजन में धर्म, साधना और भक्ति के माध्यम से आत्मकल्याण की भावना को प्रमुखता मिली।

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