कोटा के श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी, दादाबाड़ी में निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में चल रहे नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान महोत्सव का दूसरा दिन श्रद्धा, भक्ति, संयम और आध्यात्मिक साधना के वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने विधान, पूजन और आराधना में भाग लेकर आत्मकल्याण की भावना से धार्मिक अनुष्ठान किए।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी के निदेशक हुकम जैन 'काका' ने बताया कि बुधवार प्रातःकाल से ही मंदिर परिसर में धर्मावलंबियों का आगमन शुरू हो गया था। पूरे परिसर में नवकार महामंत्र, जिनवाणी और भक्तिभाव की मंगलध्वनि गूंजती रही। श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भगवान श्री आदिनाथ का अभिषेक, शांतिधारा एवं नित्य पूजन संपन्न किया। इसके बाद सिद्धचक्र महामंडल विधान के द्वितीय दिवस की विधिवत पूजा, अर्घ्य समर्पण, मंत्रोच्चार एवं धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए, जिसमें महिला एवं पुरुष श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

विधान समिति के अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि अनादिकाल से असंख्य आत्माएं संसार में भटक रही हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य आत्मा की प्राप्ति के स्थान पर बाहरी पदार्थों की प्राप्ति बन गया है।

मुनिश्री ने कहा कि भगवान की आराधना, गुरु सेवा, स्वाध्याय, तप, संयम और तीर्थयात्रा किसी सांसारिक उपलब्धि के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को उसके शुद्ध एवं वास्तविक स्वरूप तक पहुंचाने के साधन हैं। धर्म का प्रत्येक कार्य आत्मकल्याण की दिशा में उठाया गया पवित्र कदम है।

त्याग, साधना और आत्मचिंतन से प्रशस्त होता है मोक्षमार्ग

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने सरल उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई व्यक्ति अपनी ही जेब से धन निकालता है तो उसे चोरी नहीं कहा जाता, उसी प्रकार आत्मकल्याण के लिए की जाने वाली आराधना भी कर्मबंधन का कारण नहीं बनती। बंध तब उत्पन्न होता है जब मनुष्य भौतिक सुखों, परिग्रह, विषय-वासनाओं और सांसारिक आसक्तियों की कामना करता है।

उन्होंने कहा कि मोक्ष का वास्तविक अर्थ केवल शरीर का अंत नहीं, बल्कि राग, द्वेष, मोह, अहंकार और परिग्रह जैसे आंतरिक विकारों का पूर्ण त्याग है। जीवन में त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन का भाव विकसित होने पर मोक्षमार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।

मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि जिस निष्ठा, परिश्रम और समर्पण के साथ मनुष्य व्यापार, व्यवसाय और पारिवारिक दायित्वों का निर्वहन करता है, उसी भावना से धर्म-साधना करने पर जीवन का परम लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

पुण्य से मिलते हैं सम्मान और अवसर

धर्मसभा में क्षुल्लक संयम सागर जी महाराज ने पुण्य और पाप के सिद्धांत को सरल एवं प्रेरक उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि संसार में व्यक्ति को मिलने वाला सम्मान, पद, प्रतिष्ठा और अवसर केवल पुरुषार्थ का परिणाम नहीं होते, बल्कि पूर्व संचित पुण्यों के उदय का भी प्रतिफल होते हैं।

उन्होंने बताया कि एक ही संस्था या व्यापार में कार्य करने वाले कर्मचारी और प्रबंधक के प्रतिफल में दिखाई देने वाला अंतर केवल योग्यता से निर्धारित नहीं होता, बल्कि पुण्य का प्रभाव भी उसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

क्षुल्लक श्री ने कहा कि बिना पुण्य के जीवन में कोई भी महान उपलब्धि संभव नहीं है। संतों का दुर्लभ सान्निध्य, धर्मश्रवण और आराधना का अवसर भी पूर्व जन्मों के पुण्यों का परिणाम है।

उन्होंने कहा कि आज कोटा की पुण्यभूमि को निर्यापक श्रमण मुनि 108 श्री योगसागर जी महाराज का चातुर्मास एवं पावन सान्निध्य प्राप्त होना समूचे जैन समाज के सामूहिक पुण्योदय का प्रतिफल है। ऐसे दुर्लभ अवसर बार-बार प्राप्त नहीं होते, इसलिए प्रत्येक श्रद्धालु को धर्म, दान, तप, संयम और साधना के माध्यम से अपने पुण्य का निरंतर संवर्धन करना चाहिए।

विधान में हो रहे हैं प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठान

मुख्य संयोजक धर्मचंद जैन धानोप्या एवं अर्चना (रानी) सर्राफ ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतर्गत द्वितीय दिवस दूसरी पूजा के 16 तथा तृतीय पूजा के 32 अर्घ्य श्रद्धाभाव से समर्पित किए गए। प्रतिदिन अभिषेक, शांतिधारा, पूजन, विधान, प्रवचन एवं अन्य धार्मिक अनुष्ठान भक्तिमय वातावरण में आयोजित किए जा रहे हैं।

समिति के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि दूसरे दिन श्रद्धालुओं ने सभी धार्मिक अनुष्ठानों में उत्साह और श्रद्धा के साथ भाग लिया। भक्ति गीतों, मंगलाचरण, नवकार महामंत्र के सामूहिक जाप और संतों के प्रेरणादायी प्रवचनों से मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।

उन्होंने बताया कि नौ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान के आगामी दिनों में भी अभिषेक, पूजन, प्रवचन, विधान और सांस्कृतिक-धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

आज के पुण्यार्जक

समिति के उपाध्यक्ष सुमित जैन ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री पदमचंद जी (दीमापुर, नागालैंड), श्री राजकुमार जी एवं धर्मपत्नी (गुवाहाटी), श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार, श्री पदमचंद जी (नागालैंड) तथा श्री महावीर जी मित्तल परिवार द्वारा किया गया।

उन्होंने बताया कि आज के श्रावक श्रेष्ठी एवं शास्त्र भेंट के पुण्यार्जन का सौभाग्य भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक प्राप्त किया।

सिद्धचक्र महामंडल विधान के दूसरे दिन का आयोजन धर्म, साधना और आत्मचिंतन के संदेश के साथ संपन्न हुआ। संतों के प्रवचनों में त्याग, संयम, पुण्य और आत्मकल्याण के मार्ग को जीवन में अपनाने का संदेश श्रद्धालुओं तक पहुंचा।

Pratahkal Newsroom

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