कोटा: सिद्धचक्र महामंडल विधान में आर्यिका विभाश्री माताजी का प्रवचन
त्रिकाल चौबीसी परिसर में मुनिसुव्रतनाथ स्वामी के सान्निध्य में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न और समोशरण की वैज्ञानिक अवधारणा पर व्याख्यान।

कोटा के आर.के. पुरम स्थित त्रिकाल चौबीसी परिसर में सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान आठ अर्घ समर्पित करते श्रद्धालु और धर्मसभा को संबोधित करतीं आर्यिका विभाश्री माताजी।
धार्मिक अनुष्ठान एवं मंत्रोच्चार
मंदिर परिसर धर्ममय वातावरण और मंत्रोच्चार से गुंजायमान रहा। मंदिर अध्यक्ष अंकित जैन ने बताया कि प्रातः 6 बजे से निम्नलिखित धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए:
- मंत्र जाप एवं सहस्त्रनाम धारा
- अभिषेक एवं शांतिधारा
- इंद्र प्रतिष्ठा एवं सकलीकरण
विधान में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।
आर्यिका श्री विभाश्री माताजी की धर्मसभा
धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका श्री 105 विभाश्री माताजी ने भगवान के समोशरण की दिव्य अवधारणा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि:
"वर्तमान पंचम काल में भी तीर्थंकर भगवान का समोशरण अद्भुत, अलौकिक एवं वैज्ञानिक संरचना का प्रतीक है। भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों का समोशरण समान दिव्य रचना वाला रहा है।"
माताजी ने कहा कि जब तीर्थंकर भगवान केवलज्ञान को प्राप्त करते हैं, तब समोशरण की रचना स्वतः होती है। उस दिव्य क्षण में तीनों लोकों—देव, मनुष्य और तिर्यंच—के जीव भगवान के दर्शन एवं देशना के लिए समवेत होते हैं।
"समोशरण की विशेषता यह है कि वहाँ सभी के लिए समान दृष्टि और समान अवसर होता है, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होता। यह समता, करुणा और अहिंसा का सर्वोच्च प्रतीक है।"
उपस्थित गणमान्य जन
धर्मसभा में समाज के प्रमुख पदाधिकारी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे:
- समिति उपाध्यक्ष: लोकेश जैन बरमुंडा
- समिति निर्देशक: विनोद टोरडी
- संयोजक: पदम जैन दुगरिया
- कार्याध्यक्ष: प्रकाश सेठिया
- सदस्य: मुकेश पापड़ीवाल, अक्षय जैन, संजय जैन

Pratahkal Bureau
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