विज्ञान नगर स्थित कॉमर्स कॉलेज प्रांगण में ‘श्री मंगलमय चमत्कारी धाम हनुमान सेवा समिति’ के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन श्रद्धा, दर्शन और भारतीय संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास प्रख्यात संत श्री कृष्णचंद्र ठाकुर ने अपनी अमृतमयी वाणी से हजारों श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया। बुधवार को नर्मदेश्वर महादेव विवाह महोत्सव और व्यासपीठ से मेवाड़ की वीरता के बखान ने आयोजन को विशेष आयाम प्रदान किया।

कथा के दौरान श्री कृष्णचंद्र ठाकुर ने अध्यात्म और दर्शन की गहन व्याख्या करते हुए कहा कि परमात्मा मूलतः एक ही है, जिसे विद्वान अपनी दृष्टि और भाव के अनुसार विभिन्न रूपों में भजते हैं। उपनिषदों के ‘एक: विप्र बहुधा वदंति’ सूत्र की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि वही ईश्वर सर्वव्यापक है। कबीरदास के प्रसिद्ध पद ‘सब घट में मेरा साइयां’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ईश्वर निर्गुण भी है और भक्तों के प्रेम से वशीभूत होकर सगुण-साकार रूप में अवतार भी धारण करता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सनातनी को अपनी पहचान पर गर्व होना चाहिए तथा माथे पर तिलक और सिर पर शिखा धारण करना सनातन परंपरा का प्रतीक है।

कथा के सबसे भावुक प्रसंग ‘गोपी-उद्धव संवाद’ का सजीव चित्रण करते हुए महाराज श्री ने कहा कि श्रीकृष्ण के वियोग में गोपियां ऐसी अवस्था में पहुंच गई थीं, जहां जड़ और चेतन का भेद समाप्त हो गया था। पंडाल में ‘मेरी लगी श्याम से प्रीत दुनिया क्या जाने’ और ‘गोविंद मेरो है गोपाल मेरो है’ जैसे भजनों की गूंज के बीच श्रद्धालु भक्ति में सराबोर होकर झूम उठे। पूरा वातावरण ब्रजमय हो गया और कॉमर्स कॉलेज परिसर साक्षात गोकुल जैसा प्रतीत होने लगा।

शिक्षा नगरी कोटा से व्यासपीठ के माध्यम से श्री कृष्णचंद्र ठाकुर ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान शिक्षा पद्धति केवल ‘ढोंग’ बनकर रह गई है, जबकि प्राचीन भारत का ज्ञान तंत्र अत्यंत समृद्ध था। उन्होंने मैत्रेयी, मदालसा और अरुंधति जैसी विदुषी महिलाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि प्राचीन भारत में नारी आज की तुलना में अधिक शिक्षित और शास्त्रार्थ में निपुण थी। उन्होंने समाज से पुनः उन संस्कारों की ओर लौटने का आह्वान किया, जहां नारी को शक्ति और ज्ञान का सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।

‘नर्मदेश्वर शिवलिंग प्रतिष्ठा समारोह’ के अंतर्गत बुधवार को गोधूलि बेला में भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह महोत्सव वैदिक रीति-रिवाजों के साथ भव्य रूप से संपन्न हुआ। ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष के बीच कन्यादान और पाणिग्रहण संस्कार की रस्में निभाई गईं। इसी क्रम में भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मणी विवाह की आकर्षक झांकी सजाई गई, जहां वरमाला के दृश्य ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया। आयोजन समिति के महंत अशोक तिवारी ने बताया कि मंदिर में विराजमान ‘चमत्कारी हनुमान जी’ के जयकारों के बीच ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो बजरंगबली स्वयं अपने आराध्य के विवाह की अगवानी कर रहे हों।

कथा के दौरान श्री कृष्णचंद्र ठाकुर ने राजस्थान की भूमि को वीरों और धर्मात्माओं की धरती बताते हुए विशेष रूप से मेवाड़ और महाराणा प्रताप के शौर्य का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि जिस भूमि पर मीरा ने भक्ति की पराकाष्ठा को छुआ और महाराणा प्रताप ने राष्ट्र की अस्मिता के लिए घास की रोटियां खाना स्वीकार किया, उस भूमि को प्रणाम करना गौरव की बात है। उन्होंने श्रद्धालुओं से कथा के अंतिम दिन पूर्णाहुति में शामिल होने का आह्वान करते हुए कहा कि अंतिम दिन का श्रवण पूरे सात दिनों की कथा का फल प्रदान करता है।

इस भक्तिमय आयोजन में मेवाड़ राजपरिवार से डॉ. लक्ष्यराज सिंह, पूर्व मंत्री श्रीचंद्र कृपलानी, सुरेंद्र विजय, नितिन विजय, अजय राज सिंह, बाबूलाल भट्ट, भारत सिंह, रणछोड़ दास और श्यामलाल नागर सहित अनेक गणमान्य नागरिक तथा बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन समिति के महंत अशोक तिवारी ने सभी भक्तों का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि गुरुवार को कथा की पूर्णाहुति होगी।

Pratahkal Bureau

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