कोटा: सम्यग्दर्शन ही मोक्ष महल की प्रथम सीढ़ी, आर्यिका विभाश्री माताजी ने दिया नववर्ष पर आध्यात्मिक संदेश
कोटा के महावीर नगर में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी के सान्निध्य में आयोजित विश्व शांति विधान में उमड़ा जनसैलाब। माताजी ने 'सम्यग्दर्शन' को मोक्ष की पहली सीढ़ी बताते हुए श्रद्धालुओं को नववर्ष पर शुभाशीष दिया और संस्कारों व धर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला। इस आयोजन में समाज के प्रमुख पदाधिकारी और सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए।

कोटा। नवीन ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना के साथ नववर्ष का अभिनंदन करते हुए महावीर नगर विस्तार योजना स्थित जैन मंदिर में श्रद्धा का अनूठा संगम देखने को मिला। अवसर था श्री 1008 विश्व शांति विधान के भव्य आयोजन का, जहाँ मंत्रोच्चार और भक्तिमयी वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने विश्व शांति की मंगल कामना की। यह आध्यात्मिक अनुष्ठान परम पूज्य गणिनी आर्यिका 105 श्री विशुद्ध मति माताजी ससंघ के पावन सान्निध्य में हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस गरिमामय आयोजन के पुण्यार्जक खुशालचंद कोट्या, मनोज कोट्या एवं मुकेश कोट्या रहे, जिन्होंने भक्ति भाव से विधान की समस्त क्रियाएँ पूर्ण कीं।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए पूज्य गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी 'गुरुमाँ' ने अपने ओजस्वी प्रवचनों से धर्म की गहरी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मोक्ष रूपी महल तक पहुँचने के लिए सम्यग्दर्शन ही वह अनिवार्य प्रथम सीढ़ी है, जिसके बिना आध्यात्मिक प्रगति संभव नहीं है। उन्होंने जीवन में शुद्ध सम्यग्दर्शन को अंगीकार करने पर बल देते हुए कहा कि मनुष्य को अपनी भावनाओं की पवित्रता सदैव बनाए रखनी चाहिए। जैसे बोया गया बीज समय आने पर निश्चित ही फलित होता है, वैसे ही निस्वार्थ भाव से की गई प्रार्थना और शुभ भावनाएं भविष्य में सुखद परिणाम लेकर आती हैं।
आर्यिका श्री ने धर्म की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म किसी जाति विशेष की परिधि में नहीं बँधा है, बल्कि यह वह मार्ग है जो जीव का कल्याण करता है। उन्होंने कर्मों की प्रधानता को समझाते हुए तर्क दिया कि अधर्म के प्रभाव से श्रेष्ठ देव भी पतन का मार्ग अपना सकते हैं, जबकि धर्म की शक्ति से एक साधारण प्राणी भी उच्च पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है। धर्म ही वह तत्व है जो रंक को राजा बना सकता है और अधर्म राजा को भी पतन की गर्त में धकेल देता है। आचार्य भगवंतों के सूत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक सच्चा सम्यकदृष्टि जीव भय, प्रलोभन, स्नेह या लोभ के वश में होकर कभी भी कुदेव, कुगुरु और कुशास्त्र के समक्ष नतमस्तक नहीं होता।
आध्यात्मिक चर्चा के अंत में उन्होंने संस्कारों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि माता-पिता के चरण स्पर्श करना मात्र एक लोक व्यवहार नहीं, अपितु उच्च संस्कारों की जीवंत पहचान है। इस भव्य आयोजन में समाज की सक्रिय भागीदारी रही। मंदिर समिति के अध्यक्ष पवन ठौला और महामंत्री पारस लुंग्या ने व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से संभाला। इस अवसर पर सकल समाज के महामंत्री पदम बड़ला, ताराचंद बडला, उपाध्यक्ष मुकेश जैन, विनोद सकुनिया, कोषाध्यक्ष ओमप्रकाश, मनोज कोटिया, संजय बाजल, शिखर ठग, प्रमोद ठग, अनुराग जैन, प्रकाश पाटनी, ललित लुंग्या और मुकेश सांवला सहित बड़ी संख्या में समाज के गणमान्य नागरिक और श्रद्धालु उपस्थित रहे, जिन्होंने भक्ति के इस महापर्व में शामिल होकर धर्म लाभ अर्जित किया।

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