143 वर्षों के दीर्घ अंतराल के बाद कोटा में गूंजे मंगल स्वर: पार्श्वनाथ मंदिर में ध्वजा महोत्सव
कोटा के प्राचीन बड़ा उपासरा जैन मंदिर में 143 वर्षों बाद धर्म की अविरल धारा बह निकली है। आखिर क्या है उस ऐतिहासिक ध्वजा महोत्सव की कहानी जिसने शहर को भक्ति और आस्था के सैलाब में सराबोर कर दिया? इस विशेष आयोजन की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।

कोटा के रामपुरा स्थित बड़ा उपासरा जैन मंदिर में ध्वजा महोत्सव के उद्घाटन समारोह के दौरान समाजसेवी अमित धारीवाल और एकता धारीवाल पूजा-अर्चना करते हुए।
कोटा की आध्यात्मिक आभा में शुक्रवार का दिन एक ऐतिहासिक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया। रामपुरा स्थित प्राचीन बड़ा उपासरा जैन मंदिर दशकों की प्रतीक्षा के पश्चात भक्ति, आस्था और परंपरा के अद्वितीय संगम का साक्षी बना। 143 वर्षों के लंबे अंतराल के उपरांत आयोजित हो रहे तीन दिवसीय ऐतिहासिक ध्वजा महोत्सव का शुभारंभ अत्यंत भव्य और श्रद्धापूर्ण वातावरण में हुआ, जहाँ मंदिर का परिसर नवकार मंत्र के पावन गुंजायमान स्वरों और धर्मावलंबियों की अटूट आस्था से सराबोर दिखाई दिया।
महोत्सव के प्रथम दिवस का शुभारंभ पूर्ण विधि-विधान और धार्मिक मर्यादाओं के साथ किया गया। मूर्ति श्री पार्श्वनाथ ट्रस्ट की अध्यक्ष देवयानी शाह ने जानकारी देते हुए बताया कि अनुष्ठान का मुख्य केंद्र भगवान पार्श्वनाथ की शुद्धि एवं मंगल कामना रही। इस अवसर पर 18 विशेष अभिषेकों की पूजा संपन्न कराई गई, जिसमें भक्तों ने तल्लीनता के साथ भाग लिया। कार्यक्रम के औपचारिक उद्घाटन के साक्षी समाजसेवी अमित धारीवाल एवं एकता धारीवाल बने, जिन्होंने भगवान पार्श्वनाथ की पूजा-अर्चना कर आयोजन की मंगल शुरुआत की। इस पावन अवसर पर मूलनायक भगवान की धर्म ध्वजा के पुण्यार्जन का सौभाग्य देवयानी एवं शुभम को प्राप्त हुआ।
इस महोत्सव का सर्वाधिक प्रभावशाली और मुख्य आकर्षण मंदिर के शिखर पर स्थापित होने वाले ध्वजादंड का पूजन रहा। विधिकारक पंकज चौपड़ा के सानिध्य में 143 वर्षों की लंबी कालावधि के बाद संपन्न हुए इस विशेष पूजन विधान ने उपस्थित जनसमुदाय को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। यह क्षण न केवल मंदिर की परंपराओं के पुनर्जीवन का प्रतीक बना, बल्कि सदियों पुरानी आस्था की निरंतरता को भी रेखांकित कर गया। पूरे दिन मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा, जहाँ श्रद्धालु धर्म, परंपरा और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के इस अनुपम संगम को अपनी आँखों से निहारते हुए स्वयं को धन्य मानते रहे।
यह महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कोटा की सांस्कृतिक विरासत के पुनर्स्थापन का जीवंत उदाहरण है। 143 वर्षों बाद ध्वजादंड का पूजन और ध्वजा स्थापना की परंपरा को पुनः जीवित करना समाज के लिए आत्मिक शक्ति और गौरव का विषय है। मंदिर प्रबंधन और भक्तों के सामूहिक प्रयासों से आयोजित यह कार्यक्रम आने वाली पीढ़ियों के लिए परंपराओं के प्रति निष्ठा और समर्पण का एक आदर्श स्थापित करता है, जो लंबे समय तक आध्यात्मिक चेतना के रूप में जनमानस में अंकित रहेगा।

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