कोटा, 13 अक्टूबर। दिग्व्रत की मर्यादा का निष्ठापूर्वक पालन, निष्प्रयोजन प्रवृत्तियों का त्याग और स्वाध्याय की शिक्षाओं को जीवन में उतारना ही सच्चे संयम का मार्ग है। पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 73 एवं 74 की व्याख्या करते हुए दिग्व्रत और अनर्थदंडव्रत के महत्त्व को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि व्रतों का उद्देश्य केवल नियम निर्धारित करना नहीं, बल्कि मनुष्य की प्रवृत्तियों को मर्यादित करना, अनावश्यक गतिविधियों से बचना और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना है। सच्चा संयम तभी सार्थक होता है, जब व्यक्ति अपने विचारों, व्यवहार और दैनिक क्रियाकलापों में धर्म की मर्यादाओं का पालन करे।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने दिग्व्रत के अतिचारों की व्याख्या करते हुए कहा कि निर्धारित दिशाओं और क्षेत्रों की मर्यादा का उल्लंघन करना, निश्चित सीमा को अपनी सुविधा के अनुसार बढ़ा देना अथवा निर्धारित मर्यादा को भूल जाना व्रत में दोष उत्पन्न करता है। व्रत ग्रहण करने के बाद उसका निष्ठापूर्वक पालन करना आवश्यक है। व्यक्ति को अपनी सुविधानुसार नियमों में परिवर्तन करने के बजाय व्रत की मूल भावना को समझकर उसका पालन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में तीर्थयात्रा भी कई बार पर्यटन का रूप लेती जा रही है। ऐसी स्थिति में तीर्थदर्शन के पीछे निहित धार्मिक भावना, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उद्देश्य पीछे छूट जाते हैं। तीर्थयात्रा का वास्तविक प्रयोजन केवल विभिन्न स्थानों का भ्रमण करना नहीं, बल्कि जिनेंद्र भगवान के दर्शन करना, धर्म के प्रति श्रद्धा बढ़ाना, आत्मनिरीक्षण करना और अपने भावों की विशुद्धि करना है। तीर्थयात्रा तभी सार्थक होती है, जब उससे जीवन में धर्मभावना और संयम की वृद्धि हो।

स्वाध्याय के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि स्वाध्याय कर्मनिर्जरा का महत्त्वपूर्ण साधन है। धर्मग्रंथों का अध्ययन व्यक्ति को सही दिशा प्रदान करता है, लेकिन इसकी वास्तविक सार्थकता तभी है, जब अध्ययन से प्राप्त शिक्षाओं को जीवन में उतारा जाए। केवल शास्त्रों को पढ़ लेना अथवा उनके उपदेशों को सुन लेना पर्याप्त नहीं है। उनके अनुरूप आचरण करना ही वास्तविक साधना है।

उन्होंने श्रावकों को व्रत और नियम अपनाकर संयमपूर्ण जीवन जीने का अभ्यास करने के लिए प्रेरित किया। धर्म का प्रभाव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि व्यवहार, विचार और निर्णयों में भी दिखाई देना चाहिए। स्वाध्याय के माध्यम से प्राप्त विवेक जब आचरण का हिस्सा बनता है, तभी वह आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

अपरिग्रह की भावना को स्पष्ट करते हुए मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। उपलब्ध संसाधनों का विवेकपूर्वक उपयोग करने के साथ दूसरों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी धर्मपूर्ण जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। संग्रह की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ इच्छाओं और आसक्ति के विस्तार की संभावना भी बढ़ती है। इसके विपरीत, आवश्यकताओं को सीमित करने से संतोष, त्याग और आत्मसंयम की भावना विकसित होती है।

उन्होंने कहा कि वस्तुओं का संग्रह ही सुख का आधार नहीं है। वास्तविक शांति संतोष और संयम से प्राप्त होती है। व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं का आकलन करते हुए अनावश्यक संग्रह से बचना चाहिए और अपने व्यवहार में त्याग तथा विवेक को स्थान देना चाहिए।

पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन महेंद्र-अश्वनी धनोप्या द्वारा किया गया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा, श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया। श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालु परिवारों ने श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ महावीर जी मित्तल को प्राप्त हुआ, जबकि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य राकेश-शालिनी गर्ग परिवार को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर अंकिता को प्राप्त हुआ। धार्मिक प्रवचनों में दिग्व्रत की मर्यादा, स्वाध्याय, अपरिग्रह और निष्प्रयोजन प्रवृत्तियों के त्याग के माध्यम से संयमपूर्ण जीवन तथा आत्मकल्याण का संदेश दिया गया।

Bhagvati Medatwal, Kota

Bhagvati Medatwal, Kota

नाम: भगवती मेड़तवाल

वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)

कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र

बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय

परिचय 

भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।

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