कोटा, 6 नवंबर। सल्लेखना केवल जीवन के अंतिम चरण की धार्मिक साधना नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और कषायों के क्षय के माध्यम से आत्मा के शुद्ध स्वरूप को पहचानने का मार्ग है। यह साधक को संसार के दुखों से मुक्त कर शाश्वत आत्मिक सुख की ओर ले जाती है। यह विचार ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी (धनतेरस) के अवसर पर श्री दिगंबर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चल रहे मंगल चातुर्मास के अंतर्गत धर्मसभा में व्यक्त किए।

मुनि श्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 130 एवं 131 की व्याख्या करते हुए सल्लेखना के फल और मोक्ष के वास्तविक स्वरूप पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि श्रद्धा, सम्यक् विश्वास और धर्मभावपूर्वक धारण की गई सल्लेखना आत्मा को संसार के दुखों से दूर कर मोक्ष के शाश्वत सुख की ओर ले जाने वाली श्रेष्ठ साधना है। यह सुख इंद्रियातीत, अद्भुत और दुर्लभ है।

उन्होंने बताया कि सल्लेखना के माध्यम से साधक शुभ कर्मों का अर्जन करते हुए देवगति आदि के सुख प्राप्त कर सकता है। इसके बाद मनुष्य पर्याय में आकर मोक्षमार्ग की साधना को आगे बढ़ा सकता है।

मुनि श्री ने कहा कि जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार पुरुषार्थ बताए गए हैं, लेकिन मनुष्य प्रायः धर्म, अर्थ और काम तक ही सीमित रह जाता है। जबकि जीवन का वास्तविक और सर्वोच्च लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। श्रद्धा, सम्यक् विश्वास और भेदविज्ञान के माध्यम से ही निज आत्मतत्त्व की अनुभूति संभव है। मनुष्य को सात तत्त्वों के साथ आत्मतत्त्व को समझकर अपने शुद्ध स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सल्लेखना में बाधक कर्मों और कषायों को धीरे-धीरे क्षीण करते हुए साधक आत्मकल्याण के लक्ष्य की ओर बढ़ता है। अंतरंग श्रद्धा, उल्लास और आत्मविश्वास मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के सान्निध्य में श्रद्धा-भक्ति के साथ की गई साधना आत्मकल्याण का माध्यम बनती है।

जन्म, जरा, रोग और मृत्यु से रहित अवस्था ही मोक्ष

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 131 की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने मोक्ष का वास्तविक लक्षण स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जन्म, जरा, रोग, मृत्यु, शोक तथा राग-द्वेष, काम-क्रोध सहित समस्त विकारों से रहित शुद्ध, अविनाशी, स्वाधीन और निराकुल आत्मिक सुख ही मोक्ष है। मोक्ष अवस्था में सभी विभावों का अभाव हो जाता है और आत्मा अपने सहज आनंदमय स्वरूप में स्थित हो जाती है।

मुनि श्री ने कहा कि राग-द्वेष रूपी बंधनों को त्यागकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप में स्थित होना ही वास्तविक मोक्ष है। इसलिए मनुष्य को संसार के क्षणभंगुर सुखों के पीछे भागने के बजाय आत्मकल्याण, संयम, श्रद्धा और भेदविज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।

धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ निर्मल कुमार, आशीष एवं अर्पित सबदरा परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ राकेश-शालिनी एवं जागृति महिला मंडल परिवार को मिला।

सुमित सेंकी एवं मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन कमलेश, श्रीमती निर्मला एवं अशोक गोयल परिवार, पदमचंद, धर्मप्रकाश एवं आशीष कासलीवाल परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने प्राप्त किया। भक्तामर विधान में पुण्योदय मंडल ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ श्रीमती रतन बाई, जम्बू, अर्चना, रानी, अभिमन्यु, दीपांशी, दिव्यांश, मुस्कान एवं समस्त दुगेरिया परिवार ने प्राप्त किया। वहीं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य जयकुमार जी, विमला जी, सुमित सेंकी एवं बरमुंडा परिवार को प्राप्त हुआ।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना कर अर्घ्य समर्पित किए। इसके साथ ही जिनवाणी वंदना के माध्यम से धर्मलाभ अर्जित किया।

गुरुवाणी में आत्मकल्याण और मोक्ष का संदेश

मुनि श्री के प्रवचन में बताया गया कि जीवन का वास्तविक लक्ष्य संसार के क्षणभंगुर सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपनी शुद्ध आत्मा को पहचानकर शाश्वत सुख अर्थात् मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ना है। सल्लेखना श्रद्धा, संयम और कषायों के क्षय की साधना है। राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के सहज आनंदमय स्वरूप में स्थित होना ही मोक्ष है।

प्रवचन में मानसिक शांति, संयमित जीवन, सकारात्मक विचार और कषायों पर नियंत्रण को आत्मिक प्रसन्नता के साथ जीवन में संतुलन बनाए रखने में सहायक बताया गया। साथ ही प्रतिदिन देवदर्शन, जिनवाणी श्रवण, स्वाध्याय, सामायिक, संयम और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने तथा संसार के मोह को कम कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया गया।

Bhagvati Medatwal, Kota

Bhagvati Medatwal, Kota

नाम: भगवती मेड़तवाल

वर्तमान पद: रिपोर्टर / प्रातःकाल प्रतिनिधि (कोटा)

कार्यक्षेत्र: कोटा (राजस्थान) एवं आमेट तहसील क्षेत्र

बीट (मुख्य विषय): स्थानीय समाचार, राजनीति, क्राइम, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस एवं सभी विषय

परिचय 

भगवती मेड़तवाल 'प्रातःकाल' समाचार पत्र में कोटा प्रतिनिधि और रिपोर्टर के रूप में कार्यरत हैं। वह कोटा जिले के साथ-साथ आमेट तहसील क्षेत्र से जुड़ी सभी प्रकार की खबरों को कवर करती हैं। स्थानीय समाचार, प्रशासनिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और राजनीतिक घटनाक्रमों के अलावा आमेट तहसील क्षेत्र से क्राइम (अपराध) और सांस्कृतिक खबरों की रिपोर्टिंग करना उनकी मुख्य विशेषता है।

शैक्षणिक योग्यता (Education)

उन्होंने कला स्नातक (B.A.) की डिग्री हासिल की है।

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