कोटा एमएसएमई उद्योग संकट: ट्रांसफर एरिया प्रक्रिया में देरी से रीको और बैंक ऋण रुके
कोटा संभाग की सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों को भूखंड मॉर्टगेज न होने से वर्किंग कैपिटल मिलने में दिक्कत, एसएसआई एसोसिएशन ने राज्य सरकार से माँगा त्वरित समाधान।

कोटा में स्मॉल स्केल इंडस्ट्रियल एसोसिएशन (एसएसआई) की बैठक के दौरान ट्रांसफर एरिया विवाद पर चर्चा करते पदाधिकारी (बाएं से दाएं) समीर सूद, दीपक मेहता, गोविंदराम मित्तल और अन्य सदस्य।
स्मॉल स्केल इंडस्ट्रियल एसोसिएशन (एसएसआई) कोटा के तत्वावधान में गुरुवार को औद्योगिक क्षेत्रों में वर्षों से लंबित 'ट्रांसफर एरिया' की गंभीर समस्या को लेकर एक महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। इस उच्च स्तरीय बैठक में कोटा संभाग के उद्योगों के समक्ष आ रहे प्रशासनिक गतिरोधों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। एसोसिएशन ने इस बात को पुरजोर तरीके से रेखांकित किया कि इस संवेदनशील विषय पर पूर्व में जिला उद्योग केन्द्र, रीको कोटा, रीको मुख्यालय जयपुर एवं जिला प्रशासन को कई बार विस्तृत ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं। हालांकि रीको कोटा द्वारा इस प्रक्रिया से जुड़ी सभी आवश्यक रिपोर्ट एवं औपचारिकताएं पूर्ण कर उच्च स्तर पर भेजी जा चुकी हैं, परंतु राज्य सरकार के स्तर पर अंतिम निर्णय में हो रही लगातार देरी के कारण कोटा संभाग की सैकड़ों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम (एमएसएमई) इकाइयां वर्तमान में गंभीर वित्तीय संकट के दौर से गुजर रही हैं।
बैठक में एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने वास्तविक स्थिति को उजागर करते हुए बताया कि ट्रांसफर एरिया की प्रक्रिया पूर्ण नहीं होने के कारण उद्यमी अपने वैध औद्योगिक भूखंडों को बैंकों में मॉर्टगेज अथवा प्लेज नहीं कर पा रहे हैं। इस बड़ी प्रशासनिक बाधा के कारण स्थापित और नए उद्योगों को वर्किंग कैपिटल, टर्म लोन एवं अन्य आवश्यक बैंकिंग ऋण सुविधाएं प्राप्त करने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वित्तीय तरलता के अभाव का सीधा प्रतिकूल प्रभाव औद्योगिक इकाइयों के सुचारू संचालन, आधुनिकीकरण, विस्तार योजनाओं और रोजगार सृजन पर पड़ रहा है, जिससे अंततः स्थानीय अर्थव्यवस्था को भारी क्षति पहुंच रही है।
प्रशासनिक शिथिलता से निवेश प्रभावित होने का दावा करते हुए एसएसआई एसोसिएशन के अध्यक्ष दीपक मेहता ने कहा कि ट्रांसफर एरिया का लंबित होना केवल एक सामान्य प्रशासनिक या तकनीकी प्रक्रिया का विषय नहीं है, बल्कि यह सैकड़ों लघु एवं मध्यम उद्योगों की वित्तीय सेहत और उनके अस्तित्व से जुड़ा हुआ एक अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। उन्होंने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक तरफ सरकार वैश्विक मंचों पर निवेश, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और नए उद्योगों को बढ़ावा देने की बड़ी-बड़ी बातें करती है, वहीं दूसरी तरफ वर्षों से धरातल पर संचालित उद्योग मात्र एक अनुमति के अभाव में बुनियादी बैंकिंग सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। उन्होंने चेताया कि यदि उद्योगों को समय पर वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे, तो नए निवेश और रोजगार सृजन के लक्ष्य को हासिल करना असंभव होगा, इसलिए सरकार को नई घोषणाओं के साथ-साथ लंबित फाइलों के समयबद्ध निस्तारण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
योजनाओं के क्रियान्वयन में होने वाली देरी को सबसे बड़ी बाधा बताते हुए एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष श्री गोविंदराम मित्तल ने अपने दीर्घकालीन औद्योगिक अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि भारतीय एमएसएमई क्षेत्र की सबसे बड़ी कमजोरी नीतियों या योजनाओं की कमी नहीं, बल्कि उनके धरातलीय क्रियान्वयन में होने वाला अत्यधिक विलंब है। प्रशासनिक लेत-लतीफी के कारण सरकारी प्रोत्साहनों का लाभ वास्तविक उद्यमियों तक पहुंचने में दो से तीन साल का समय लग जाता है, जिससे कई बार योजना की प्रासंगिकता ही समाप्त हो जाती है। उन्होंने मांग की कि उद्योगपति अपनी पूंजी और साहस के बल पर जोखिम उठाकर निवेश करता है, राजस्व देता है और बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करता है, इसलिए उद्योगों से जुड़े प्रशासनिक नीति-नियमों में त्वरित निर्णय, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि उद्यमियों का भरोसा तंत्र पर बना रहे।
अर्थव्यवस्था में एमएसएमई इकाइयों को मुख्य आधार बताते हुए एसोसिएशन के सचिव समीर सूद ने संस्था के प्रयासों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि एसएसआई एसोसिएशन पिछले कई दशकों से उद्यमियों और प्रशासन के बीच एक मजबूत सेतु के रूप में कार्य करती रही है और आधारभूत ढांचे के विकास से लेकर नीतिगत सुधारों तक, संस्था ने हमेशा उद्योग जगत की आवाज को बुलंद किया है। उन्होंने सांख्यिकीय आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि एमएसएमई क्षेत्र देश की जीडीपी में 25 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है और देश के कुल रोजगार में इसकी भागीदारी 50 प्रतिशत से भी अधिक है। समीर सूद ने रोष व्यक्त किया कि इतने महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद छोटे उद्यमियों को प्रक्रियात्मक जटिलताओं और गैर-जरूरी लालफीताशाही से जूझना पड़ रहा है, जिसे तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए।
वैश्विक मंदी के दौर में घरेलू उद्योगों को संबल देने की आवश्यकता प्रतिपादित करते हुए लघु उद्योग भारती के पूर्व अध्यक्ष विपिन सूद ने वर्तमान वैश्विक परिदृश्य पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान में एमएसएमई क्षेत्र केवल स्थानीय या क्षेत्रीय चुनौतियों से ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों की मार से भी जूझ रहा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और निर्यात बाजारों में आई मंदी के कारण लघु उद्योग पहले से ही भारी दबाव में हैं। उन्होंने याद दिलाया कि स्वयं माननीय प्रधानमंत्री जी ने भी विभिन्न मंचों से वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों के भारतीय उद्योगों पर पड़ने वाले प्रभावों को स्वीकार किया है। ऐसे नाजुक समय में स्थानीय स्तर पर ट्रांसफर एरिया जैसी लंबित फाइलों के कारण उद्योगों के वित्तीय मार्ग अवरुद्ध होना बेहद चिंताजनक है, जिसमें सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर राहत प्रदान करनी चाहिए।
औद्योगिक गतिरोध को दूर करने के लिए एसएसआई एसोसिएशन ने राज्य सरकार के समक्ष अपनी प्रमुख मांगें रखी हैं। एसोसिएशन की मांग है कि रीको और जिला उद्योग केंद्र के स्तर पर ट्रांसफर एरिया से संबंधित जितने भी मामले लंबित हैं, उन पर राज्य सरकार बिना किसी देरी के तत्काल सकारात्मक निर्णय जारी करे। इस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से संपन्न करने के लिए विभाग द्वारा एक स्पष्ट और बाध्यकारी समय-सीमा घोषित की जाए। इसके साथ ही एमएसएमई उद्योगों से जुड़े फाइलों और प्रकरणों के निस्तारण के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और 'सिंगल विंडो सिस्टम' को और अधिक प्रभावी बनाया जाए। उद्यमियों ने मांग की है कि उद्योगों को कार्यशील पूंजी और बैंकिंग ऋण प्राप्त करने में आ रही समस्त प्रशासनिक व तकनीकी रुकावटों को प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जाए तथा औद्योगिक क्षेत्रों के विकास और लंबित विवादों की समीक्षा के लिए उच्च स्तर पर एक विशेष टास्क फोर्स या उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक का नियमित आयोजन सुनिश्चित हो।

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