कोटा के श्री बड़े मथुराधीश मंदिर में 30 अप्रैल को मनेगी नृसिंह जयंती
पुष्टिमार्गीय प्रथम पीठ में ठाकुर जी का विशेष अभ्यंग और जलविहार दर्शन होगा, सूर्यास्त के समय गोधूलि वेला में होगा भगवान का प्राकट्य उत्सव।

राजस्थान के कोटा स्थित पुष्टिमार्गीय प्रथम पीठ श्री बड़े मथुराधीश मंदिर का आधिकारिक प्रतीक चिह्न, जहां 30 अप्रैल को नृसिंह चतुर्दशी का भव्य आयोजन किया जाएगा।
राजस्थान के कोटा स्थित शुद्धाद्वैत प्रथम पीठ श्री बड़े मथुराधीश मंदिर, पाटनपोल में आगामी 30 अप्रैल को भगवान नृसिंह का प्राकट्य उत्सव अपार श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। पुष्टिमार्गीय परंपराओं के अनुसार आयोजित होने वाले इस पावन अवसर पर विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से प्रभु के अद्भुत अवतार की लीलाओं का गुणगान किया जाएगा। मंदिर के व्यवस्थापक चेतन शेठ ने आयोजन की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि उत्सव का शुभारंभ प्रातः काल से ही मंगला दर्शन के साथ हो जाएगा, जिसके पश्चात प्रभु को चंदन, आंवला और फुलेल से अभ्यंग कराया जाएगा। ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी को देखते हुए प्रभु को शीतलता प्रदान करने हेतु विशेष प्रबंध किए गए हैं, जिसके अंतर्गत राजभोग दर्शन से लेकर संध्या आरती तक जल का थाल सजाया जाएगा, जिसमें प्रभु जलविहार करेंगे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान नृसिंह का प्राकट्य गोधूलि वेला (संध्या काल) में हुआ था, इसी भाव को आत्मसात करते हुए मंदिर में सूर्यास्त के समय नृसिंह जन्म के विशेष दर्शन आयोजित होंगे। संध्या आरती के पश्चात ठाकुर जी के सम्मुख शालिग्राम जी को पंचामृत स्नान कराया जाएगा। चूंकि नृसिंह भगवान को उग्र अवतार माना जाता है, अतः उनके क्रोध के शमन और उन्हें शीतलता प्रदान करने के भाव से शयन दर्शन के समय विशेष 'शीतल सामग्री' का भोग अर्पित किया जाएगा। उत्सव की पूर्व संध्या पर मंदिर के चौक में शीतल जल का छिड़काव कर वातावरण को सुखद बनाया जाएगा।
प्रथम पीठ के युवराज मिलन कुमार बाबा ने नृसिंह जयंती के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि पुष्टिमार्ग में मुख्य रूप से चार अवतारों—श्री राम, श्री कृष्ण, नृसिंह भगवान और वामन अवतार—को विशेष मान्यता दी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभु ने ये चारों अवतार अपने उन नि:साधन भक्तों पर कृपा करने के लिए लिए थे जो पूर्णतः ईश्वर के भरोसे थे। इन अवतारों के माध्यम से की गई लीलाओं को 'पुष्टिलीला' माना जाता है, जो भक्त और भगवान के अटूट प्रेम का जीवंत प्रतीक हैं। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि पुष्टिमार्गीय दर्शन और परंपराओं के प्रति जनमानस की गहरी निष्ठा को भी प्रदर्शित करता है।

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