कोटा: पति-पत्नी मिलकर प्रभु सेवा करें तो संन्यास से भी श्रेष्ठ है गृहस्थ आश्रम - पूज्य राघव ऋषि
कोटा के भीमेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित भागवत कथा के सातवें दिन पूज्य राघव ऋषि ने सुदामा चरित्र के माध्यम से निःस्वार्थ भक्ति और गृहस्थ धर्म का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि सुदामा जैसी भक्ति से ही ईश्वर की अनायास कृपा प्राप्त होती है और पति-पत्नी साथ मिलकर प्रभु सेवा करें तो गृहस्थ आश्रम संन्यास से भी श्रेष्ठ है। जानें इस भव्य आयोजन और सुदामा-कृष्ण मिलन के भावुक प्रसंग के बारे में।

कोटा: पति-पत्नी मिलकर प्रभु सेवा करें तो संन्यास से भी श्रेष्ठ है गृहस्थ आश्रम - पूज्य राघव ऋषि
कोटा। धर्मनगरी कोटा के गणेश नगर स्थित भीमेश्वर महादेव मंदिर में श्रद्धा और भक्ति की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है। श्रीराम कृष्ण कथा ज्योतिष समिति द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम दिवस पर पूज्य राघव ऋषि जी ने सुदामा चरित्र के मर्म को समझाते हुए भक्ति का ऐसा स्वरूप प्रस्तुत किया, जिसने श्रोताओं के हृदय को झकझोर दिया। कथा के अंतिम चरण में ऋषि जी ने यह प्रतिपादित किया कि यदि पति-पत्नी मिलकर प्रभु की आराधना और सेवा करें, तो गृहस्थ जीवन किसी भी संन्यास धर्म से कहीं अधिक श्रेष्ठ और वंदनीय हो जाता है।
सप्तम दिवस की कथा का मुख्य केंद्र सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता रही। पूज्य राघव ऋषि ने कहा कि ईश्वरीय कृपा अनायास ही प्राप्त नहीं होती, उसके लिए सुदामा जैसी निःस्वार्थ भक्ति और अटूट विश्वास की आवश्यकता है। उन्होंने समाज में व्याप्त विडंबनाओं पर प्रहार करते हुए कहा कि मनुष्य पुण्य किए बिना श्रेष्ठ फल की कामना करता है और पाप कर्मों में लिप्त होकर उनके परिणामों से बचना चाहता है, यही मानवीय दुखों का मूल कारण है। वेदों की व्याख्या करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्मकांड, उपासना और ज्ञान तीनों का संगम गृहस्थ जीवन की मर्यादा में ही निहित है। धर्म सम्मत मार्ग से धन अर्जित करना और गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए निरंतर प्रभु का स्मरण करना ही जीवन का वास्तविक ध्येय होना चाहिए।
सुदामा शब्द की गहन व्याख्या करते हुए ऋषि जी ने बताया कि इसका अर्थ है 'सुंदर रस्सी से बंधा हुआ'। सांसारिक जीव मोह-माया और रिश्तों के बंधनों में जकड़ा रहता है, लेकिन सुदामा जैसी अनन्य भक्ति ही इन बंधनों को मोक्ष के मार्ग में बदल सकती है। उन्होंने सुदामा की पत्नी सुशीला को एक आदर्श पतिव्रता का प्रतीक बताते हुए कहा कि जब दंपत्ति का लक्ष्य एक ही परमात्मा हो, तो वह घर ही मंदिर बन जाता है। कथा के दौरान वह क्षण अत्यंत भावुक कर देने वाला था जब भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा को सिंहासन पर बैठाकर अपने आंसुओं से उनके चरण पखारे। यह प्रसंग इस बात का जीवंत प्रमाण है कि परमात्मा वस्त्र या वैभव नहीं, अपितु केवल निर्मल और निष्कपट हृदय देखते हैं।
कथा के मध्य सौरभ ऋषि द्वारा गाए गए हृदयस्पर्शी भजन “अरे द्वारपालों कन्हैया से कह दो” ने उपस्थित जनसमूह को भाव-विभोर कर दिया और मंदिर परिसर तालियों की गड़गड़ाहट और जयकारों से गुंजायमान हो उठा। इस धार्मिक अनुष्ठान में विशिष्ट अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। समाजसेवी राजेश बिड़ला, उद्यमी प्रेम भाटिया, पूर्व राज्यमंत्री हरपाल राणा, वरिष्ठ नेता पंकज मेहता एवं जिलाध्यक्ष राखी गौतम ने पूज्य ऋषिजी को माल्यार्पण कर आशीर्वाद ग्रहण किया। व्यासपीठ और पवित्र पोथी का पूजन राकेश सरोजा, रमाकांत शर्मा एवं देवकीनंदन गर्ग द्वारा पूर्ण विधि-विधान से संपन्न कराया गया। प्रचार सचिव श्री रामेश्वर गुप्ता ने सूचना दी कि कथा का समापन बुधवार को प्रातः 9 बजे पूर्णाहुति के साथ होगा, जिसके पश्चात 11 से 2 बजे तक पूज्य राघव ऋषिजी के विशेष प्रवचनों के साथ इस दिव्य आयोजन को विश्राम दिया जाएगा।

Pratahkal Bureau
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