कोटा हार्ट हॉस्पिटल: 97 दिन वेंटिलेटर पर रहे नवजात को मिला नया जीवन
63 दिन की उम्र में गंभीर हालत में भर्ती हुए मासूम को राजस्थान में पहली बार नेजल एच.एफ.ओ मशीन और एमएए योजना के सफल क्रियान्वयन से बिना सर्जरी स्वस्थ किया गया।

कोटा हार्ट हॉस्पिटल में 97 दिनों तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद स्वस्थ हुए नवजात के साथ डॉ. महेंद्र गुप्ता, डॉ. नीता जिंदल, डॉ. अंकुर जैन और एनआईसीयू स्टाफ की टीम।
कोटा के कोटा हार्ट हॉस्पिटल में एक नवजात बच्चे को 97 दिनों तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद नया जीवन मिला है। बच्चों का जन्म पूरे समय में 3 किलोग्राम का हुआ था, लेकिन जन्म के बाद बच्चे को सांस की नली में दूध चले जाने के कारण वेंटिलेटर पर रखना पड़ा। जब बच्चे को कोटा हार्ट हॉस्पिटल में अत्यधिक गंभीर हालत में भर्ती कराया गया, उस वक्त उसकी उम्र 63 दिन की थी। बच्चा दिमागी रूप से बेहोश था, पूरे शरीर में तेज बुखार था और उसके हाथ पैरों में अकड़न थी। उसका वजन घटकर 2.8 किलोग्राम रह गया था और वह सांस की मशीन पर था। उसकी छाती में गड्ढे पढ़ रहे थे, जिसके कारण उसे सांस लेने में अत्यधिक परेशानी हो रही थी।
आधुनिक तकनीक और उपचार प्रक्रिया
डॉ महेंद्र गुप्ता के अनुसार बच्चों को MAA योजना के तहत भर्ती किया गया। बच्चे को एच.एफ.ओ वेंटिलेटर पर लिया गया और नली के माध्यम से मां का दूध दिया गया जिससे उसे पोषण मिला। बच्चे की सीटी स्कैन और सोनोग्राफी कराई गई एवं खून की जांच भी की गई लेकिन बार-बार वेंटिलेटर से हटाने के प्रयास में उसके फेफड़े सिकुड़ जा रहे थे। एक महीने में बच्चे को पांच बार वेंटिलेटर से हटाने का प्रयास किया गया। ऐसी स्थिति में नेजल एच.एफ.ओ मशीन पर रखा गया जिसमें सफलता मिली और अस्पताल में कुल 34 दिन तक सांस की मशीन पर रखा गया। इस प्रकार जन्म से लेकर कुल 97 दिन तक नवजात वेंटिलेटर पर रहा।
चिकित्सा क्षेत्र में नया कीर्तिमान
डॉ नीता जिंदल के अनुसार "यह राजस्थान का पहला मामला है और हाड़ौती क्षेत्र में इस मशीन का प्रयोग पहली बार किया गया जो कि एक कीर्तिमान है।" उचित पोषण, अनुभवी इलाज और ईमानदार प्रयासों के कारण बच्चे की स्थिति में सुधार हुआ। लगभग एक महीने पहले उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और इस बीते एक महीने में बच्चे के एक्सरे और अन्य जांचे कराई गई। अब बच्चे की स्थिति सामान्य है व उसका वजन नियमित रूप से बढ़ रहा है और एक्सरे में भी उसके लंग्स सामान्य नजर आ रहे हैं।
बिना सर्जरी के मिली बड़ी सफलता
अस्पताल के निदेशक डॉ राकेश जिंदल के अनुसार "इस मामले की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि पूरे उपचार के दौरान बच्चों को ट्रैक स्टॉमी यानी सांस की नली में छेद करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।" इस सफल उपचार में टीम मेम्बर्स डॉ. महेंद्र गुप्ता (नियोनेटोलोजिस्ट), डॉ. नीता जिंदल, डॉ. अंकुर जैन एवं एन.आई.सी.यू. स्टाफ का विशेष योगदान रहा।

Pratahkal Bureau
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