कोटा के गीताभवन में समर कैंप: बच्चों ने सीखा आत्मरक्षा का हुनर
महाराजा श्री अग्रसेन सोशल ग्रुप महिला मंडल द्वारा आयोजित 11 दिवसीय शिविर में बच्चों को योग, ध्यान और आत्मरक्षा का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

कोटा के गीताभवन में आयोजित समर कैंप के दौरान प्रशिक्षिका अर्चना शेखावत की देखरेख में बच्चे लाठी चलाने का अभ्यास करते हुए, जिसका उद्देश्य आत्मरक्षा और शारीरिक कौशल विकसित करना है।
कोटा, 2 जून। स्कूली छुट्टियों के दौरान बच्चों को हुनरमंद और सुसंस्कृत बनाने के उद्देश्य से महाराजा श्री अग्रसेन सोशल ग्रुप महिला मंडल द्वारा कोटा के गीताभवन में ग्यारह दिवसीय समर कैंप का आयोजन किया जा रहा है। इस अनूठे शिविर में बच्चे आधुनिक कौशल के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, योग और आत्मरक्षा के गुर सीख रहे हैं।
शिविर के मुख्य आकर्षणों में योगाचार्य परमानंद गर्ग द्वारा बच्चों को ध्यान-योग के माध्यम से 'इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना' नाड़ियों का गहन चिंतन कराया जा रहा है। कार्यक्रम संयोजक संजय गोयल ने बताया कि चेयरपर्सन पुष्पा गर्ग के मार्गदर्शन में बच्चों की 'सिक्स सेंस' (छठी इंद्री) को जाग्रत करने के लिए खेल-खेल में विशेष अभ्यास करवाए जा रहे हैं, ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़ सके। शिविर में आत्मरक्षा का प्रशिक्षण एक प्रमुख अंग है, जहाँ बिगी गाँव से पधारे संत शिरोमणि नागाचार्य रामशरण गिरी की उपस्थिति में बच्चों को दण्ड प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान उन्होंने रुद्राक्ष का पूजन कर उनका वितरण भी किया। प्रशिक्षिका अर्चना शेखावत ने विशेष रूप से बालिकाओं को लाठी चलाने और शत्रु का प्रतिकार करने का कड़ा अभ्यास कराया।
महिला मंडल की सदस्य सपना गोयल ने जानकारी दी कि शिविर के अंतर्गत 4 जून को मर्म चिकित्सकों द्वारा कमर दर्द, बदन दर्द और हाथ-पैर के दर्द से पीड़ित मरीजों के लिए एक निशुल्क चिकित्सा शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। शिविर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 'धर्म संस्कार' सत्र रहा, जहाँ बच्चों ने आचार्य श्रवण कुमार के समक्ष अपनी धार्मिक जिज्ञासाएँ रखीं। इस सत्र में भव्या ने महिलाओं द्वारा माँग में सिन्दूर लगाने के कारण, लक्ष्य शाक्यवाल ने पीपल की पूजा के महत्व और ऐशिका गोयल ने महिलाओं द्वारा हनुमान जी की पूजा के नियमों पर प्रश्न किए। आचार्य श्रवण कुमार ने शास्त्रों के प्रमाण के साथ बच्चों की इन सभी शंकाओं का तार्किक और संतोषजनक समाधान किया। यह ग्यारह दिवसीय समर कैंप बच्चों में सांस्कृतिक मूल्यों के बीजारोपण और शारीरिक दक्षता के विकास की दिशा में एक सार्थक प्रयास सिद्ध हो रहा है।

