कषायों का त्याग जीवन को श्रेष्ठ बनाता है, क्रोध-मान-माया-लोभ से दूर रहने का संदेश
कोटा के रामपुरा में वर्षावास के दौरान पूज्य श्री योगेश मुनि जी ने कषायों के त्याग, संयम और आत्मबल से जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संदेश दिया।

कषायों का त्याग मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकार व्यक्ति को आत्मिक शांति से दूर करते हैं। इनका त्याग करने से मन निर्मल होता है और जीवन में संयम, शांति तथा सद्भाव की स्थापना होती है। यह संदेश बुधवार को श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्री संघ, रामपुरा में चल रहे वर्षावास के दौरान पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने श्रावकों को दिया।
आचार्य प्रवर 1008 श्री हीरा चन्द्र जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा., संत रत्न आज्ञानुवर्ती पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा., पूज्य श्री जितेन्द्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 का 2026 का वर्षावास श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्री संघ, रामपुरा में चल रहा है। संत प्रवचनों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं।
पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने श्रावक के गुणों की चर्चा करते हुए कहा कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकार मनुष्य को आत्मिक शांति से दूर करते हैं। श्रावकों को अपने व्यवहार में विनम्रता रखने, किसी के प्रति द्वेष नहीं रखने और धर्म के सिद्धांतों को जीवन में उतारने का आग्रह किया।
प्रवचन के दौरान भजन ‘तेरे नाम की प्रीत गुरुवार हो गई मुझको, फीकी लगती दुनिया सारी देख कर तुमको’ प्रस्तुत किया गया। भजन में आराध्य के प्रति समर्पण और श्रद्धा का भाव व्यक्त किया गया। श्रद्धालु भजन के दौरान भाव-विभोर नजर आए।
महाराज साहब ने कहा कि धर्म केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने का मार्ग है। जब व्यक्ति कषायों को कम करता है, संयम को अपनाता है और आत्मबल को मजबूत करता है, तभी उसका जीवन वास्तविक अर्थों में श्रेष्ठ और सार्थक बनता है।
पूज्य श्री जितेन्द्र मुनि म.सा. ने जल, आहार, संयम और आत्मबल के महत्व पर प्रकाश डालते हुए श्रावकों को जीवन में कषायों का त्याग करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जब तक पानी है, तब तक जिंदगी है और जब तक जल है, तब तक तन है। आहार और पानी जीवन के लिए बेहद आवश्यक हैं, लेकिन मनुष्य को केवल शरीर के पोषण तक सीमित न रहकर आत्मकल्याण की ओर भी ध्यान देना चाहिए।
महाराज साहब ने कहा कि शरीर को टिकाए रखने के लिए आहार की आवश्यकता होती है और संयम को टिकाए रखने के लिए भी स्वस्थ शरीर जरूरी है। साधना के मार्ग में आत्मबल का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि उन्हें न तो देवलोक का नंदनवन प्रिय है और न ही केवल शरीर का मोह, बल्कि आत्मबल ही सबसे अधिक प्रिय है।
संथारा के प्रसंग में उन्होंने कहा कि संथारा केवल शरीर त्यागने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की ओर बढ़ने वाली महान साधना है। इसके लिए ज्ञान, दर्शन, संयम और आहार-पानी से संबंधित अनेक बातों का विवेकपूर्वक ध्यान रखना आवश्यक होता है। उन्होंने बताया कि संथारा लेते समय साधक को आहार और शरीर से जुड़ी अनेक मर्यादाओं एवं नियमों का ध्यान रखना पड़ता है।
संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि प्रतिदिन साधु-संतों के सानिध्य में धर्म लाभ प्राप्त कर श्रावक धर्म व आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। मंत्री अनिल दक ने बताया कि प्रतिदिन प्रवचन सुबह 8.45 से 10.00 बजे तक चल रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में श्रावक पहुंच रहे हैं।

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