आस्था, प्रेम और हरित चेतना का विराट संगम बनी जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा
कोटा से जहाजपुर तक आचार्य 108 श्री प्रज्ञासागर जी महामुनिराज के सानिध्य में निकली जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा ने आस्था, प्रेम, संयम और पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश दिया। पौधारोपण, स्वच्छता और आत्मसंयम के संकल्प के साथ यह यात्रा समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनी।

कोटा। तपोभूमि प्रणेता आचार्य 108 श्री प्रज्ञासागर जी महामुनिराज के पावन सानिध्य में कोटा से अतिशय क्षेत्र जहाजपुर तक आयोजित जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा ने जैन समाज को आस्था, संयम, प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का गहन संदेश दिया। चातुर्मास उपरांत प्रारंभ हुई यह पदयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सामाजिक अनुशासन और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का जीवंत उदाहरण बनकर उभरी।
प्रवचनों के दौरान गुरुदेव ने पदयात्रा के आध्यात्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि चातुर्मास के पश्चात साधुओं का विहार स्वाभाविक प्रक्रिया है, किंतु जब श्रावक भी साधना भाव से साथ चलते हैं, तब वह यात्रा साधारण नहीं रह जाती, बल्कि जिनधर्म प्रभावना की परमात्म पदयात्रा बन जाती है। उन्होंने गीतात्मक शैली में प्रेम और वात्सल्य का संदेश देते हुए कहा कि धर्म का मूल तत्व प्रेम है। आचार्य वीरसेन के वचनों और कबीर के प्रसिद्ध दोहे के माध्यम से उन्होंने सम्यक दृष्टि और आत्मिक शुद्धता के भाव को समाज के समक्ष रखा। साथ ही सामाजिक व्यवस्था पर संकेत करते हुए उन्होंने पदाधिकारियों के चयन को चुनाव की अपेक्षा संस्कार आधारित प्रक्रिया बताया।
पदयात्रा के दौरान धर्मध्वज, रथ और वाद्य यंत्रों के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली गई। मार्ग में श्रद्धालु श्रावकों ने गुरुदेव का पाद प्रक्षालन किया, आरती उतारी और पुष्पवर्षा के साथ जयघोष किया। पुण्यर्जक परिवार बग्घी पर सवार रहा, जिससे वातावरण में भक्ति और उल्लास का विशेष संचार हुआ। अध्यक्ष लोकेश जैन सीसवाली ने बताया कि गुरुदेव ने गुरु आस्था परिवार की सक्रिय सहभागिता की सराहना करते हुए इस चातुर्मास को ऐतिहासिक बताया। पदयात्रा के मुख्य संयोजक मिथुन मित्तल तथा सह संयोजक निलेश जैन खटकीड़ा और अजय जैन मेहरू रहे।
इस पदयात्रा का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरण संरक्षण का संदेश रहा। चैयरमेन यतीश जैन खेडावाला ने बताया कि यात्रा मार्ग में पौधारोपण किया जाएगा, जिससे हरित चेतना को जन-जन तक पहुंचाया जा सके। आध्यात्मिक साधना के साथ प्रकृति संरक्षण का यह संकल्प समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता को सुदृढ़ करेगा।
संयम और अनुशासन को पदयात्रा का आधार बनाते हुए महामंत्री नवीन जैन दौराया ने बताया कि सभी पदयात्रियों के लिए रात्रि भोजन निषेध अनिवार्य किया गया है। यह नियम तप और आत्मसंयम की साधना को मजबूत करता है। इसके साथ ही स्वच्छता पर भी विशेष ध्यान दिया गया। यात्रा मार्ग में आहार चर्या, श्रावकों के भोजन और पदयात्रा प्रस्थान के पश्चात स्थलों की सफाई सुनिश्चित की जाएगी, ताकि किसी भी स्थान को प्रदूषित किए बिना यात्रा आगे बढ़े।
यात्रा मार्ग की जानकारी देते हुए बताया गया कि 14 दिसंबर को रिद्धि–सिद्धि नगर से बढ़गांव की ओर पदयात्रा प्रारंभ हुई, जो 15 से 19 दिसंबर तक विभिन्न पड़ावों से होते हुए अतिशय क्षेत्र जहाजपुर पहुंचेगी। 20 दिसंबर को प्रातः 1008 मुनिसुव्रतनाथ भगवान का अभिषेक, शांतिधारा एवं समापन समारोह आयोजित किया जाएगा। आयोजकों के अनुसार 15 वर्ष से अधिक आयु के पदयात्री ही इस यात्रा में शामिल हो सकेंगे और उनके लिए आवश्यक नियम निर्धारित किए गए हैं।
कार्यक्रम में भाजपा शहर जिलाध्यक्ष राकेश जैन, डीवाईएसपी प्रवीण जैन, सकल दिगंबर जैन समाज संरक्षक राजमल पाटौदी, विमल जैन, जगदीश जिंदल, अध्यक्ष प्रकाश बज सहित गुरु आस्था परिवार के अनेक पदाधिकारी और सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। जिनधर्म प्रभावना पदयात्रा आस्था, संयम, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संस्कारों के समन्वय के रूप में समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनकर सामने आई है।
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