राजस्थान के हाड़ौती अंचल की स्वर्णिम विरासत को वैश्विक पटल पर गौरवान्वित करने के उद्देश्य से इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इन्टेक), कोटा चैप्टर द्वारा एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है। 'विश्व विरासत दिवस' के उपलक्ष्य में आयोजित 'माई हाड़ौती माई हेरिटेज' अभियान के तहत फोटो प्रविष्टियाँ भेजने की अंतिम तिथि अब जन-उत्साह को देखते हुए बढ़ा दी गई है। कोटा चैप्टर के कन्वीनर निखिलेश सेठी ने आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों को सहेजने और जन-जन तक पहुँचाने के संकल्प के साथ शुरू हुए इस अभियान में अब प्रतिभागी 18 अप्रैल 2026 तक अपनी प्रविष्टियाँ साझा कर सकेंगे। यह पहल कोटा के साथ-साथ बूंदी, बारां और झालावाड़ के आम नागरिकों को अपनी विरासत के प्रति जागरूक करने और उसे कैमरे के लेंस से दुनिया के सामने लाने का एक सशक्त मंच प्रदान कर रही है।

इस वृहद अभियान के अंतर्गत प्रतिभागी हाड़ौती क्षेत्र की मूर्त विरासत जैसे ऐतिहासिक इमारतों, स्मारकों, प्राचीन मूर्तियों, कलाकृतियों, और कलात्मक बावड़ियों सहित प्राकृतिक विरासत स्थलों के उत्कृष्ट छायाचित्र भेज सकते हैं। संस्था का मूल ध्येय उन अनछुए और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थलों को प्रकाश में लाना है जो हमारी गौरवशाली परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। चयनित प्रविष्टियों को न केवल सराहा जाएगा, बल्कि उन्हें इंटेक कोटा के आधिकारिक फेसबुक पेज और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाड़ौती के पर्यटन और संस्कृति को एक नवीन एवं विशिष्ट पहचान मिल सके।

प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. एकता जैन सेठी ने तकनीकी दिशा-निर्देश साझा करते हुए स्पष्ट किया कि प्रतिभागियों को अपनी फोटो के साथ कुछ अनिवार्य विवरण ब्लॉक लेटर्स में लिखकर संलग्न करने होंगे। इसमें विरासत स्थल का नाम, उसका सटीक स्थान और प्रेषक का नाम शामिल होना अनिवार्य है। प्रविष्टियाँ भेजने के लिए केवल व्हाट्सएप नंबर 8800265975 का ही उपयोग मान्य होगा। वहीं, को-कन्वीनर बीएस हाड़ा ने क्षेत्र के युवाओं, पेशेवर फोटोग्राफरों और इतिहास के प्रति समर्पित प्रेमियों से पुरजोर अपील की है कि वे इस अभियान में बढ़-चढ़कर अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। यह अभियान मात्र एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अपनी विरासत के संरक्षण में सक्रिय सहभागी बनने का एक पुनीत अवसर है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सांस्कृतिक जड़ों को सुरक्षित रखेगा।

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