शिक्षा की नगरी के रूप में विख्यात कोटा की धरा को प्रख्यात कथा वाचक इंद्रेश उपाध्याय ने 'धर्म की नगरी' और 'पुष्टिमार्ग का अभेद्य गढ़' बताते हुए नमन किया है। कोटा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान आध्यात्मिक उद्बोधन देते हुए उन्होंने कहा कि यह इस शहर का परम सौभाग्य है कि यहाँ पुष्टिमार्ग की प्रथम पीठ श्री मथुराधीश प्रभु स्वयं विराजमान हैं। इसके साथ ही, श्रीनाथजी की चरण चौकी की गरिमामयी उपस्थिति इस क्षेत्र को आध्यात्मिक रूप से अत्यंत समृद्ध और विशिष्ट बनाती है।

कथा के प्रवाह में भावुक होते हुए व्यास पीठ से इंद्रेश उपाध्याय ने कोटा की भौगोलिक और आध्यात्मिक विशिष्टता को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि कोटा नगर साक्षात गोविंद देव जी (जयपुर), श्रीनाथजी (नाथद्वारा) और पावन वृंदावन धाम के मध्य स्थित है, जो इसे भक्ति के केंद्र के रूप में स्थापित करता है। उन्होंने शहर की शैक्षणिक पहचान की सराहना करते हुए कहा कि यहाँ सरस्वती की विशेष कृपा बरसती है और देशभर से बालक अपना भविष्य उज्जवल करने के ध्येय से यहाँ आते हैं। गहन आध्यात्मिक दर्शन प्रस्तुत करते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि शास्त्रों के अनुसार 'आत्मा ही पुत्र के रूप में जन्म लेती है'।

कथा के दौरान इंद्रेश उपाध्याय ने अपनी सुमधुर वाणी में सूरदास जी के सुप्रसिद्ध पद "यह लीला सब करत कान्हाई" का गायन कर उपस्थित भक्त समुदाय को भाव-विभोर कर दिया। रास पंचाध्यायी और कंस वध जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों का सजीव वर्णन करते हुए उन्होंने "नख पर धर लो गिरिराज नाम गिरधारी पै है" तथा "श्याम हृदय भजन से प्रकट" सहित कई भक्तिमय भजनों की प्रस्तुतियाँ दीं। कथा के विश्राम पर बड़ी संख्या में एकत्रित श्रद्धालुओं ने भगवान श्री कृष्ण के गगनभेदी जयकारों के साथ आरती संपन्न की। अंत में उन्होंने आह्वान किया कि कोटा के युवाओं को अपनी उच्च शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों की इस अमूल्य थाती को भी संजोकर रखना चाहिए।

Pratahkal Bureau

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