कोटा, 1 जून। भारतीय राष्ट्रीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज दुबे ने एनपीके, पोटाश और मिश्रित उर्वरकों के दामों में की गई भारी बढ़ोतरी की तीव्र निंदा करते हुए इसे अन्नदाताओं पर चौतरफा मार करार दिया है। उन्होंने कहा कि खाद की इन बढ़ती कीमतों ने देश के किसानों की कमर पूरी तरह से तोड़कर रख दी है। एक तरफ भाजपा सरकार किसानों की आय दोगुनी से लेकर आठ गुनी तक करने का बड़ा दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ खरीफ सीजन शुरू होने से ठीक पहले खाद के दामों में बेतहाशा वृद्धि कर किसानों को आर्थिक संकट में धकेला जा रहा है। एनपीके खाद की प्रति बोरी पर ₹400 से लेकर ₹550 तक की भारी बढ़ोतरी किया जाना पूरी तरह से एक किसान विरोधी निर्णय है, जिसने काश्तकारों पर असहनीय अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल दिया है।

किसान नेता मनोज दुबे ने देश की कृषि व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर करते हुए कहा कि देश का किसान पहले से ही महंगे बीज, डीजल, बिजली की बढ़ती दरों और मौसम की अनिश्चित मार को झेल रहा है। ऐसी विकट परिस्थितियों के बीच खाद के बढ़े हुए दामों ने खेती की लागत को और अधिक बढ़ा दिया है, जिससे कृषि कार्य पूरी तरह घाटे का सौदा बनता जा रहा है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि इस जनविरोधी फैसले पर तुरंत पुनर्विचार किया जाए और खाद की बढ़ी हुई कीमतों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार अन्नदाता पर लगातार महंगाई का बोझ डालकर कृषि और गांव दोनों को कमजोर करने पर आमादा है, जो बेहद शर्मनाक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है।

उर्वरकों के मूल्य संकट के साथ-साथ मनोज दुबे ने समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद को लेकर भी सरकार को घेरा है। उन्होंने किसानों के गेहूं का एक-एक दाना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदने की पुरजोर मांग की है। सरकार द्वारा गेहूं खरीद के लिए बढ़ाई गई मात्र 7 दिवस की अवधि को पूरी तरह से अपर्याप्त बताते हुए उन्होंने मांग की है कि गेहूं खरीद की समय सीमा को अंतिम रूप से बढ़ाकर 30 जून किया जाए और इसके साथ ही सभी केंद्रों पर किसानों को पर्याप्त मात्रा में बारदाना उपलब्ध कराया जाए।

उन्होंने वर्तमान प्रशासनिक विसंगतियों को रेखांकित करते हुए कहा कि समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद की अंतिम तिथि पहले 31 मई निर्धारित थी, जिसे सरकार ने केवल 7 दिन के लिए आगे बढ़ाया है। हकीकत यह है कि अभी भी देश और क्षेत्र के लाखों किसानों के गेहूं की तुलाई होना बाकी है। यदि गेहूं की समर्थन मूल्य पर खरीद की समय सीमा को 30 जून तक नहीं बढ़ाया गया, तो किसानों को अपनी खून-पसीने की मेहनत से उपजाई गई फसल को मजबूरन स्थानीय व्यापारियों के हाथों औने-पौने दामों पर बेचने के लिए विवश होना पड़ेगा।

मनोज दुबे ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि गेहूं खरीद की सरकारी अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद से किसान गहरी चिंता, मानसिक तनाव और भारी परेशानी के दौर से गुजर रहा है। चुनाव और विभिन्न मंचों पर सरकार के प्रतिनिधियों ने किसानों से समर्थन मूल्य पर गेहूं का एक-एक दाना खरीदने का बड़ा वायदा किया था, लेकिन धरातल पर गेहूं की पूरी खरीद नहीं हो पा रही है। इस व्यवस्थागत अभाव के कारण अब किसानों को अपनी जायज मांगों और गेहूं खरीद की समय सीमा बढ़वाने के लिए मजबूरन आंदोलन की राह पकड़नी पड़ रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में घोर निंदनीय एवं दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को हठधर्मिता छोड़कर तुरंत किसानों के गेहूं की समर्थन मूल्य पर पूरी खरीद सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त होने से बचाया जा सके।

Pratahkal Newsroom

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