शहीद डिप्टी कमांडेंट सुभाष शर्मा की 59वीं जयंती कोटा में मनाई गई
कोटा के स्वामी विवेकानंद विद्यालय में अमर शहीद सुभाष शर्मा की जयंती पर डीआईजी प्रभाकर जोशी और वीरांगना बबिता शर्मा ने छात्रों को वीरता की गाथा सुनाई।

सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जांबाज अधिकारी और मरणोपरांत राष्ट्रपति के पुलिस पदक (शौर्य) से विभूषित अमर शहीद डिप्टी कमांडेंट सुभाष शर्मा की 59वीं जयंती सोमवार को कोटा के महावीर नगर तृतीय स्थित स्वामी विवेकानंद विद्यालय में गरिमामय समारोह के रूप में मनाई गई। इस अवसर पर विद्यालय के प्रांगण में जनसैलाब उमड़ पड़ा, जहां उपस्थित सैकड़ों विद्यार्थियों और गणमान्य नागरिकों ने देश के इस वीर सपूत की शौर्य गाथा सुनी और अटूट देशभक्ति का संकल्प लिया।
शहादत और शौर्य के इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित डीआईजी प्रभाकर जोशी (PPMG) ने अपने प्रिय मित्र और बैचमेट को याद करते हुए अत्यंत भावुक संबोधन दिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने और शहीद सुभाष ने न केवल साथ में कमांडो ट्रेनिंग ली और ऑफिसर बने, बल्कि कश्मीर में उनकी पोस्टिंग भी एक साथ हुई थी। कई सैन्य ऑपरेशनों को एक साथ अंजाम देने वाले इन दो मित्रों की जोड़ी 16 अप्रैल 1996 को टूट गई, जब एक कायराना आईईडी (IED) ब्लास्ट में सुभाष शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए। डीआईजी जोशी ने उस अत्यंत दुखद क्षण को साझा किया जब उन्हें ही अपने मित्र के पार्थिव शरीर को श्रीनगर से उनके परिवार तक लाने और अंतिम यात्रा में शामिल होने का उत्तरदायित्व मिला। उन्होंने गर्व के साथ कहा कि उन्हें ऐसे देशभक्त और बहादुर ऑफिसर का मित्र होने पर गौरव है।
1993 से 1996 के बीच कश्मीर के भीषण और चुनौतीपूर्ण हालातों का जिक्र करते हुए डीआईजी प्रभाकर जोशी ने बताया कि सुभाष शर्मा आतंकियों के लिए साक्षात 'खौफ' का पर्याय थे। उनकी अदम्य वीरता के कारण ही आतंकियो ने उनका नाम 'पीटर' और 'Terror of Terror' (आतंक का आतंक) रख दिया था। लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे कुख्यात आतंकी संगठनों ने उनकी बहादुरी से त्रस्त होकर उन पर भारी इनाम तक घोषित कर दिया था। जब आतंकी उन्हें सीधे मुकाबले में पराजित नहीं कर सके, तो 16 अप्रैल 1996 की शाम पेट्रोलिंग से लौटते समय उन पर विश्वासघाती आईईडी हमला किया गया। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि घटनास्थल पर जमीन में 15 फुट गहरा गड्ढा हो गया, किंतु शहीद सुभाष ने अपने अंतिम श्वास तक बीएसएफ के ध्येय वाक्य 'मृत्युपर्यंत कर्तव्य' को चरितार्थ किया।
समारोह में उपस्थित शहीद की पत्नी वीरांगना बबिता शर्मा ने 'संकल्प से सिद्धि' का मंत्र देते हुए विद्यार्थियों को प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि कैसे बचपन में 'विजेता' फिल्म के नायक से प्रेरित होकर सुभाष शर्मा ने पायलट बनने का स्वप्न देखा था और विपरीत परिस्थितियों के बाद भी सीमा सुरक्षा बल में असिस्टेंट कमांडेंट के रूप में कमीशन प्राप्त करने के साथ ही पायलट बनकर अपने सपने को पूर्ण किया। पति के बलिदान के बाद मात्र 9 माह के इकलौते पुत्र क्षितिज की परवरिश की जिम्मेदारी को उन्होंने एक चुनौती की तरह स्वीकार किया। पिता के बलिदान से प्रेरित होकर बालक क्षितिज ने मात्र 10 वर्ष की आयु में सेना में जाने का संकल्प लिया और देशभर के 6 लाख अभ्यर्थियों में से 13वां स्थान प्राप्त कर एनडीए के माध्यम से सैन्य अधिकारी बने। वर्तमान में क्षितिज भारतीय सेना में मेजर के पद पर कार्यरत होकर मां भारती की रक्षा कर रहे हैं। वीरांगना बबिता ने जानकारी दी कि आगामी 16 अप्रैल को पंजाब के गुरदासपुर स्थित शहीद के नाम पर बनी बीओपी (BOP) पर उनकी प्रतिमा के समक्ष प्रतिवर्ष की भांति बीएसएफ अधिकारियों और जवानों द्वारा सलामी शस्त्र देकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी।
विधाभारती कोटा के जिला अध्यक्ष महावीर गौतम ने विद्यार्थियों को शहीद परिवार के त्याग और अनुशासन से सीख लेने का आह्वान किया। उन्होंने वीरांगना बबिता द्वारा दी गई उत्कृष्ट परवरिश की सराहना करते हुए बताया कि कैसे मेजर क्षितिज ने एनडीए में गोल्ड मेडल प्राप्त कर अपने पवित्र संकल्प को सिद्ध किया। वीरांगना बबिता शर्मा ने स्वामी विवेकानंद विद्यालय के प्राचार्य डॉ. महेश शर्मा का हार्दिक आभार व्यक्त किया जिनके प्रयासों से नई पीढ़ी इस वीरतापूर्ण गाथा से रूबरू हो सकी। विद्यालय के लगभग 300-400 छात्र-छात्राओं द्वारा संस्कृत में की गई प्रार्थना और अनुशासित व्यवहार ने सभी को प्रभावित किया। कार्यक्रम का समापन अमर शहीदों की स्मृति को समर्पित इन पंक्तियों के साथ हुआ कि "शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।"

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