बकानी: 'मेरा अवगुण भरा शरीर...' जब पं. कमल किशोर नागर ने छेड़ा भजन तो झूम उठा हाड़ौती, हजारों भक्तों के सैलाब ने तोड़े सारे रिकॉर्ड
बकानी के थोबड़िया खुर्द में पं. कमल किशोर नागर जी की भागवत कथा के दूसरे दिन हाड़ौती और मालवा से भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। 'मेरा अवगुण भरा शरीर' भजन और बाल संत गोविंद के प्रवचनों ने माहौल को भक्तिमय बना दिया। नागर जी ने मन को वश में करने और आचरण की शुद्धता पर जोर दिया। जानिए कथा के दूसरे दिन की पूरी रिपोर्ट।

बकानी: झालावाड़ जिले के बकानी कस्बे के समीप स्थित ग्राम थोबड़िया खुर्द में शुक्रवार को आस्था का ऐसा महाकुंभ उमड़ा कि हाड़ौती और मालवा की सीमाएं एक हो गईं। मौका था प्रसिद्ध गौसेवक संत पूज्य पं. कमल किशोर जी नागर के मुखारविंद से चल रही श्रीमद् भागवत कथा के दूसरे सोपान का, जहां हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने पांडाल को खचाखच भर दिया। इस आध्यात्मिक समागम में जैसे ही पूज्य श्री नागर जी ने 'मेरा अवगुण भरा शरीर, कहो ना कैसे तारोगे..' भजन के स्वर छेड़े, पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया और उपस्थित जनसमूह भावविभोर होकर झूम उठा।
कथा के दूसरे दिन व्यासपीठ से जीवन के मर्म को समझाते हुए पूज्य पं. कमल किशोर जी नागर ने कहा कि मनुष्य का मन शेर और शैतान की भांति होता है, जो निरंतर इधर-उधर दौड़ता रहता है। इसे वश में करना कतई आसान नहीं है, लेकिन कथा और सत्संग वह माध्यम है जो इस चंचल मन रूपी शेर को भक्ति के पिंजरे में कैद कर सकता है। उन्होंने भक्तों को मंत्र दिया कि जब भी चित्त और बुद्धि शांत न हो या मन में कोई गहरी व्यथा हो, तो कथा श्रवण अवश्य करना चाहिए। उन्होंने आचरण की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि सौ मण ज्ञान से मात्र एक तौला आचरण बनता है और जब यह श्रेष्ठ आचरण आत्मा में प्रवेश करता है, तभी व्यवहार में विनम्रता आती है।
भक्त और भगवान के संबंधों की व्याख्या करते हुए पूज्य नागर जी ने कहा कि कथा में आकर पहले 40 मिनट मन को शांत और स्थिर करने का अभ्यास करना चाहिए। यदि गुरु के पास वाणी है, तो भक्त को पानी की तरह होना चाहिए। जिस तरह कोरे वस्त्र पर कंकू की एक बूंद गिरने से वह पवित्र हो जाता है, उसी प्रकार जीवन में गमी और कमी के समय यदि भक्ति का एक छींटा भी लग जाए, तो जीव का परमात्मा से सीधा संबंध जुड़ जाता है। उन्होंने समाज को संदेश दिया कि असली ब्रह्म ज्ञान की पहचान करना आवश्यक है, जैसे सोने और पीतल या सांप और रस्सी का भेद जानना जरूरी है। सूरदास जी का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि भले ही वे नेत्रहीन थे, लेकिन उनकी लाठी में भी ज्ञान का वास था।
कथा के दौरान मंच पर मौजूद 11 वर्षीय बाल संत गोविंद ने अपनी ओजस्वी वाणी से श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। बाल संत ने 'मेरी प्रीत न छूटे नंदलाला से..' भजन सुनाकर पांडाल में मौजूद हर शख्स की आंखें नम कर दीं। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारित कर आगे बढ़े, तो देर-सवेर उसे सफलता अवश्य मिलती है। बाल संत गोविंद ने एक बड़ा ही तार्किक प्रश्न उपस्थित जनसमूह के सामने रखा कि जब दुनिया में हंगामा करने से लोगों को खूब पैसे मिल सकते हैं, तो भला भजन करने से भगवान क्यों नहीं मिल सकते। कार्यक्रम के अंत में आयोजक परिवार द्वारा श्रीमद् भागवत जी की महाआरती की गई, जिसके साथ ही यह दिव्य दिवस विश्राम को प्राप्त हुआ।

Ruturaj Ravan
यह प्रातःकाल मल्टीमीडिया में वेबसाइट मैनेजर और सोशल मीडिया एक्जीक्यूटिव के रूप में कार्यरत हैं, और पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता व डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इससे पूर्व उन्होंने दैनिक प्रहार में वेबसाइट प्रबंधन और सोशल मीडिया के लिए रचनात्मक कंटेंट निर्माण और रणनीतियों में अनुभव अर्जित किया। इन्होंने कोल्हापुर के छत्रपति शिवाजी महाराज विश्वविद्यालय से स्नातक और हैदराबाद के सत्या इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा पूरी की। इन्हें SEO मैनेजमेंट, सोशल मीडिया और उससे संबंधित रणनीतियाँ तैयार करने में व्यापक अनुभव है।
