धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाली वह आधारशिला है, जिसकी मजबूती श्रद्धा और सम्यक ज्ञान के समन्वय से निर्मित होती है। यही संदेश परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्या भूषण सन्मति सागर जी महाराज की परम शिष्या एवं भारत गौरव गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने श्री बालिता दिगम्बर जैन मंदिर, कुन्हाड़ी में आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दिया।

धर्मसभा में आर्यिका श्री ने कहा कि जिस प्रकार किसी वृक्ष की जड़ जितनी मजबूत होती है, वह उतना ही विशाल, ऊंचा और फलदायी बनता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में श्रद्धा जितनी दृढ़ होगी, धर्म उतना ही अधिक प्रभावी और फलदायी सिद्ध होगा। उन्होंने कहा कि धर्म की वास्तविक शक्ति केवल श्रद्धा में नहीं, बल्कि श्रद्धा के साथ सम्यक ज्ञान के समन्वय में निहित है। आत्मा और परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान ही श्रद्धा को स्थिरता और मजबूती प्रदान करता है। बिना ज्ञान के श्रद्धा अधूरी रहती है, जबकि बिना श्रद्धा के ज्ञान निष्प्रभावी हो जाता है।

आर्यिका श्री ने श्रद्धा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि श्रद्धा ही वह दृष्टि है, जिसके माध्यम से पाषाण की प्रतिमा में भी भगवान के दर्शन संभव होते हैं। श्रद्धा के अभाव में वही प्रतिमा केवल पत्थर प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि श्रद्धा से प्रेरित होकर की गई भगवान की पूजा-अर्चना अनंत पापों के क्षय का कारण बनती है और आत्मकल्याण के मार्ग को प्रशस्त करती है।

अपने प्रवचन में उन्होंने एक सरल उदाहरण के माध्यम से श्रद्धा की शक्ति को समझाते हुए कहा कि मुद्रा का एक साधारण कागज तब तक मूल्यहीन होता है, जब तक उस पर भारतीय रिजर्व बैंक की मान्यता और मुहर नहीं होती। उसी प्रकार जब किसी प्रतिमा में भगवान की प्रतिष्ठा होती है, तब श्रद्धालु उसमें परमात्मा के स्वरूप का अनुभव करते हैं। श्रद्धा धर्म की जड़ है और विश्वास उसका आधार।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य अपने दैनिक जीवन में नाई, चिकित्सक तथा विभिन्न संस्थाओं पर विश्वास करता है, उसी प्रकार धर्म पर किया गया विश्वास जीवनभर मार्गदर्शन प्रदान करता है। धर्म केवल जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन के पश्चात भी आत्मा के कल्याण का आधार बनता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को श्रद्धा, ज्ञान और श्रेष्ठ आचरण के समन्वय से धर्ममय जीवन अपनाने का प्रयास करना चाहिए।

धर्मसभा में सकल समाज के परम संरक्षक विमल जैन नांता, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, जेके जैन, नरेश वैध, मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड़, पारस कासलीवाल, स्वतंत्र पाटनी, बसंतीलाल दोषी, नितेश खटोड़, उत्तम बास्टा, कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला, मनोज जैसवाल, आदित्य, संजय सांवला, पारस लुहाड़िया, ईश्वर सोनी सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

धर्मसभा में व्यक्त किए गए विचारों ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि धर्म का वास्तविक स्वरूप तभी साकार होता है, जब श्रद्धा, ज्ञान और आचरण तीनों का संतुलित समन्वय जीवन में उतारा जाए। यही समन्वय आत्मिक उन्नति और कल्याण का सच्चा मार्ग प्रशस्त करता है।

Pratahkal Bureau

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