GGवी अरविन्द सिसोदिया ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले की प्राचीर से दिए गए संबोधन में प्रयुक्त “दिमागी नक्सल” शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि यह केवल हिंसक नक्सली गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन वैचारिक प्रवृत्तियों की ओर भी संकेत करता है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं, राष्ट्रीय एकता और भारत की संप्रभुता को कमजोर करने का प्रयास करती हैं तथा देश में दुष्प्रेरणाएँ फैलाती हैं।

सिसोदिया ने कहा कि भारत ने लंबे समय तक नक्सलवाद की चुनौती झेली है। इस दौरान देश ने महसूस किया कि नक्सलवादी विचारधारा से जुड़े लोग न तो भारत के संविधान को मानते थे, न लोकतंत्र में विश्वास रखते थे, न कानून-व्यवस्था को स्वीकार करते थे और न ही निर्वाचन के माध्यम से जनता के निर्णय में विश्वास रखते थे। उनकी भाषा हिंसा और शस्त्रों की भाषा थी। वे अपनी मांगों, अपने समर्थन और अपने विचारों को हिंसक व्यवहार के माध्यम से प्रदर्शित करते रहे तथा उनकी कार्रवाइयों में क्रूर हिंसा स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।

सिसोदिया ने कहा कि इसी मानसिकता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से ‘दिमागी नक्सल’ कहकर देश को सावधान किया है। इस संदर्भ में जो लोग प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इस श्रेणी में आते हैं, वे अब अपने-अपने खोल से बाहर निकलकर स्वयं ही उछल-कूद और शोर मचाने लगे हैं। उनकी बेचैनी और प्रतिक्रिया से स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि प्रधानमंत्री की बात कितनी गहराई तक पहुँची है। ऐसे अराजक तत्व स्वयं ही अपने विचारों और व्यवहार को उजागर कर रहे हैं। देश उन्हें देख रहा है और जनता भी सब कुछ समझ रही है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का “दिमागी नक्सल” से सावधान रहने का आह्वान वर्तमान समय में अत्यंत आवश्यक और महत्वपूर्ण हो गया है। कुछ भारत-विरोधी ताकतें देश की आंतरिक राजनीतिक फूट और पतन का लाभ उठाकर भारत में अराजकता उत्पन्न करना चाहती हैं तथा लोकतंत्र और संविधानसम्मत शासन व्यवस्था को विफल करना चाहती हैं, ताकि भारत की प्रगति, उन्नति और विकास को रोककर उसे एक आश्रित देश बनाए रखा जा सके।

सिसोदिया ने कहा कि पूरे देश को, माता-पिता, भाई-बहन तथा समस्त देशभक्त नागरिकों को सचेत हो जाना आवश्यक है, क्योंकि भारत-विरोधी ताकतों के निशाने पर भारत की भावी युवा पीढ़ी है। वे युवाओं को बहका-फुसलाकर हिंसा और अराजकता के रास्ते पर डालकर अपना हित साधने तथा उनका भविष्य खराब करना चाहती हैं। इसी कारण प्रधानमंत्री को लालकिले की प्राचीर से देश को यह बड़ा संदेश देना पड़ा है।

सिसोदिया ने कहा कि भारत की राजनीति में दलगत नैतिकता और कथित आंदोलनों में व्यापक गिरावट आई है। देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री को जान से मारने तक के बयान आए हैं और उनके प्रति हिंसक उकसावे के अनेक बयान सामने आए हैं। वहीं संवैधानिक संस्थाओं को दबाव में लेने के लिए झूठे आरोपों की बौछार की जा रही है और आंदोलनों के नाम पर हिंसक अराजकता के प्रयास हो रहे हैं। संसद को अलोकतांत्रिक हुल्लड़बाजी के कारण चलने नहीं दिया जा रहा है। यहाँ तक कि संसद में घुसकर विद्रोह की कोशिश भी की जा चुकी है।

उन्होंने कहा कि भारत ने लंबे समय तक हिंसक वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद की चुनौती का सामना किया है। सरकार के सुरक्षा, विकास और प्रशासनिक प्रयासों से देश के विभिन्न क्षेत्रों में इस हिंसक चुनौती को नियंत्रित किया गया है। किंतु किसी भी हिंसक विचारधारा की चुनौती केवल हथियारों के समाप्त हो जाने से पूरी तरह समाप्त नहीं होती। उसके पीछे मौजूद वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों को पहचानना तथा उनके लोकतंत्र-विरोधी दुष्प्रचार पर विमर्श करना भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए लोकतंत्र, संविधान, राष्ट्रीय एकता और विधि के शासन को नकारने वाली किसी भी प्रवृत्ति का प्रबल विरोध किया जाना चाहिए, क्योंकि हमारी मूल स्वतंत्रता और संप्रभुता का आधार ही लोकतंत्र है।

सिसोदिया ने कहा कि नक्सलवाद का हिंसक स्वरूप सशस्त्र संघर्ष, राज्य व्यवस्था के विरुद्ध हिंसा और अराजकता के रूप में सामने आया। उसी प्रकार यदि कोई विचारधारा लोकतांत्रिक संस्थाओं को अस्वीकार करने, संवैधानिक प्रक्रिया को कमजोर करने, अराजकता और हिंसा को वैध ठहराने अथवा भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता के विरुद्ध वातावरण बनाने का प्रयास करती है, तो उसका लोकतांत्रिक समाज में वैचारिक स्तर पर प्रतिरोध आवश्यक है। ऐसी किसी भी प्रवृत्ति का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं है।

सिसोदिया ने कहा कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति, असहमति और शांतिपूर्ण राजनीतिक गतिविधि का अधिकार देता है। इसलिए सरकार की आलोचना, नीतियों का विरोध, संसद में बहस, धरना-प्रदर्शन और लोकतांत्रिक असहमति को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र की शक्ति ही इस बात में है कि सत्ता की नीतियों पर प्रश्न पूछे जा सकें और विपक्ष अपनी वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत कर सके। किंतु असहमति और राष्ट्रविरोध, आलोचना और अपमान तथा राजनीतिक संघर्ष और हिंसक अराजकता के बीच स्पष्ट अंतर है और उस अंतर की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है। इसकी सीमा का टूटना ही लोकतंत्र-विरोधी प्रवृत्ति को जन्म देता है।

सिसोदिया ने कहा कि कुछ वामपंथी संगठन और उनके साथ कुछ विपक्षी दलों के नेतागण भी समय-समय पर सार्वजनिक मंचों पर ऐसे नारे और वक्तव्य देते हैं, जिनमें भारत के विखंडन, हिंसात्मक संघर्ष अथवा राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के समर्थन की भावना दिखाई देती है। इन्हें कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने उदाहरण के रूप में “भारत तेरे टुकड़े होंगे”, “कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी”, “भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी” और “हमें क्या चाहिए—आजादी” जैसे नारों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे नारों में दिखाई देने वाली राष्ट्रविरोधी मानसिकता राष्ट्रहित के विरुद्ध है।

सिसोदिया ने कहा कि इसी प्रकार “ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद”, “मनुवाद मुर्दाबाद”, “साम्राज्यवाद मुर्दाबाद” और “पूंजीवाद मुर्दाबाद” जैसे नारों को भी व्यापक वैचारिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए, क्योंकि किसी भी सामाजिक या वैचारिक वर्ग के प्रति घृणा और हिंसा जैसी मानसिकता लोकतांत्रिक समाज के लिए उचित नहीं है।

उन्होंने कहा कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टियों के शीर्ष नेताओं द्वारा विदेशों में भारत की आंतरिक राजनीति पर की गई टिप्पणियों को भी इसी लोकतांत्रिक कसौटी पर परखा जाना चाहिए। विदेश में सरकार की आलोचना करना अपने आप में राष्ट्रविरोधी नहीं है, लेकिन यदि कोई सार्वजनिक वक्तव्य जानबूझकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक पदों अथवा देश की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा को कमजोर करने की दिशा में जाता है, तो उस व्यक्ति की मानसिकता को राष्ट्रविरोधी होने के कटघरे में अवश्य खड़ा करता है।

सिसोदिया ने कहा कि राष्ट्रहित और राजनीतिक दलगत हित एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। सरकार बदल सकती है, राजनीतिक दल बदल सकते हैं और नीतियों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाएँ, न्यायपालिका, संसद, निर्वाचन व्यवस्था और भारत की संप्रभुता जैसी मूल संस्थाएँ पूरे राष्ट्र की साझा धरोहर हैं। राजनीतिक संघर्ष इन संस्थाओं को मजबूत करने वाला होना चाहिए, उन्हें कमजोर करने वाला नहीं।

सिसोदिया ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में प्रखर बहस लोकतंत्र की आवश्यकता है। सरकार की कमियों को उजागर करना, विपक्ष की नीतियों की आलोचना करना, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक विफलताओं पर प्रश्न उठाना और जनता के मुद्दों को सदन में मजबूती से उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। किंतु व्यक्तिगत अपमान, गाली-गलौज और असंसदीय भाषा, चरित्र पर अनावश्यक प्रहार, तथ्यहीन आरोप, संस्थाओं के प्रति लगातार अवमाननापूर्ण व्यवहार तथा भारत की सांस्कृतिक और नैतिक परंपराओं के विपरीत आचरण गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध कीजिए, लेकिन हिंसा का समर्थन मत कीजिए; सरकार की आलोचना कीजिए, लेकिन संविधान को कमजोर मत कीजिए; सत्ता से असहमति रखिए, लेकिन राष्ट्र की एकता और अखंडता को चुनौती मत दीजिए। देश के विरोधी शत्रु राष्ट्रों, आतंकवादियों और दंगाइयों का कम से कम समर्थन तो मत कीजिए। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक आचरण की मूल भावना है।

सिसोदिया ने अंत में कहा कि भारत में लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है; यह संविधान में आस्था, कानून के शासन का सम्मान, शांतिपूर्ण असहमति, संस्थाओं की गरिमा, नागरिक अधिकारों और राष्ट्रीय एकता के प्रति प्रतिबद्धता का समग्र स्वरूप है। जो भी विचारधारा इन मूल्यों को मजबूत करती है, वह लोकतंत्र की सहयोगी है और जो प्रवृत्ति हिंसा, अराजकता, संवैधानिक अस्वीकार अथवा राष्ट्र की एकता को कमजोर करने की दिशा में जाती है, उसके प्रति समाज को सजग रहना होगा। यही “दिमागी नक्सल” के विरुद्ध वास्तविक वैचारिक लड़ाई है।

भवदीय

अरविन्द सिसोदिया

9414180151

Pratahkal Newsroom

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