भारत रत्न से सम्मानित हों आचार्य विद्यासागर जी — समाज दिगम्बर जैन समाज की मांग


गुरु स्मृति में उमड़ा श्रद्धा का सागर

कोटा। युगदृष्टा, संत शिरोमणि, आचार्य भगवन् श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के द्वितीय समाधि दिवस महोत्सव का आयोजन रिद्धि सिद्धि नगर जैन समाज द्वारा श्रद्धा एवं भक्ति भाव से किया गया। साधना के हिमालय को श्री 108 विद्यासागर जी महाराज विनयांजलि दी गई और द्वितीय समाधि महोत्सव मनाया गया।

आयोजन एवं धार्मिक अनुष्ठान

  • मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि यह कार्यक्रम आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद तथा मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के सानिध्य में सम्पन्न हुआ।
  • दोपहर 1 बजे से रिद्धि सिद्धि जैन मंदिर में आचार्य श्री की संगीतमय पूजन, विनयांजलि सभा एवं संगीतमय महाआरती आयोजित की गई।
  • इसके उपरांत विशेष थाल सजाकर अष्ट द्रव्य से पूजन किया गया।

मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज का उद्बोधन

विनयांजलि सभा में मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा कि—

"आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के जीवन में मात्र 9 वर्ष की आयु में आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के दर्शन एवं प्रवचन सुनने के बाद वैराग्य की प्रबल भावना जागृत हुई थी। बाल्यकाल में ही उनके मन में धर्म और आत्मा के प्रति गहन जिज्ञासा उत्पन्न हो गई थी, जिससे लौकिक शिक्षा में उनका मन नहीं लगा। वे अन्य बच्चों की भांति खेलकूद में न लगकर मंदिरों में प्रवचन एवं चिंतन में लीन रहने लगे। उसी समय उन्होंने बाल ब्रह्मचर्य धारण कर आगे चलकर पूर्ण वैराग्य ग्रहण करने का दृढ़ संकल्प लिया। बाद में वे पदयात्री बनकर गुरु ज्ञानसागर जी महाराज के पास पहुंचे और वैराग्य जीवन का प्रारंभ किया।"

मुनि योगसागर जी महाराज ने यह भी कहा कि उन्हें अत्यंत हर्ष है कि वे आचार्य परंपरा में साधु बने। उन्होंने बताया कि बाल्यावस्था में ही आचार्य श्री ने उन्हें नमोकार मंत्र सिखाया था और पिछले 65 वर्षों से वे उनके धर्मगुरु रहे। उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण गुरु आज्ञा के पालन में निहित है।

आर्यिका माताजी एवं मुनि संघ के संस्मरण

गणिनी आर्यिका 105 आर्यिका प्रशममति माताजी ने कहा कि—

"आचार्य श्री के प्रति बच्चों में भी गहरी श्रद्धा विद्यमान है। बच्चे विश्वास से कहते हैं कि यदि वे बीमार हों और आचार्य श्री का नाम लें तो वे स्वस्थ हो जाएंगे।"

सभा में अन्य मुनिराजों ने भी अपने अनुभव साझा किए:

  • मुनि निर्मोहसागर जी: “आचार्य श्री साधना के हिमालय थे। जिसके जीवन में गुरु नहीं, उसका जीवन प्रारंभ नहीं। गुरु मिट्टी को सोना बना देते हैं और गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा ही जीवन का मार्ग प्रशस्त करती है।”
  • मुनि निरोगसागर जी: “यदि जीवन भी लगा दें तो आचार्य श्री के गुणों की पूर्ण माला नहीं लिख सकते। वे शारीरिक रूप से भले ही हमारे बीच नहीं हैं, पर आत्मिक रूप से सदैव जुड़े रहेंगे।”
  • उपस्थिति: सभा में मुनि 108 निरामयसागर जी एवं मुनि निर्भीकसागर जी ने भी शिरकत की।

भारत रत्न की मांग एवं समाज की उपस्थिति

इस अवसर पर सकल समाज के अध्यक्ष प्रकाश बज ने विनयांजलि अर्पित करते हुए कहा कि गुरु की प्रसन्न मुद्रा मात्र से लोगों के कष्ट दूर हो जाते थे। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि आचार्य भगवन् श्री विद्यासागर जी महाराज को भारत रत्न से सम्मानित कर इस सम्मान की गरिमा बढ़ाई जाए।

गणमान्य जन एवं सौभाग्यशाली परिवार:

  • कार्यक्रम का संचालन: संजय सांवला
  • पादप्रक्षालन का सौभाग्य: सीए अजय जैन
  • शास्त्र भेंट का सौभाग्य: मनोज जैसवाल परिवार
  • विशेष उपस्थिति (मनोज जैन आदिनाथ के अनुसार): सकल समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, परम संरक्षक विमल जैन नांता, विनोद टोरडी, कार्याध्यक्ष मनोज जैसवाल, नरेश वेद, कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला सहित बड़ी संख्या में समाजबंधु उपस्थित रहे।

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