जगपुरा में आचार्य प्रज्ञासागर जी ने पूर्वाचार्यों के जीवनवृत्त संकलन और जैन परंपरा संरक्षण पर दिया मार्गदर्शन
जगपुरा में आयोजित संध्याकालीन मंगल जिनदेशना में आचार्य 108 प्रज्ञासागर जी ने जैन धर्म की आचार्य और श्रुत परंपरा के संरक्षण और पूर्वाचार्यों के जीवनवृत्त संकलन पर मार्गदर्शन दिया। कार्यक्रम में श्रद्धालुओं ने इतिहास और परंपरा सुरक्षित रखने का संकल्प लिया।

कोटा। जगपुरा में आयोजित संध्याकालीन मंगल जिनदेशना कार्यक्रम में परम पूज्य आचार्य 108 प्रज्ञासागर जी मुनिराज ने जैन श्रावक समाज को संबोधित करते हुए जैन धर्म की आचार्य और श्रुत परंपरा के ऐतिहासिक संरक्षण पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। आचार्यश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को बताया कि भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के बाद स्थापित आचार्य परंपरा जैन धर्म की अमूल्य धरोहर है, जिसे सुरक्षित रखना वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए आवश्यक है।
आचार्य प्रज्ञासागर जी ने जोर देते हुए कहा कि भगवान महावीर से लेकर वर्तमान तक के सभी पूर्वाचार्यों का जीवनवृत्त संकलित स्वरूप में उपलब्ध होना चाहिए, ताकि श्रवण परंपरा का इतिहास सुरक्षित रहे। उन्होंने नेमिचंद ज्योतिचार्य द्वारा संकलित दो महत्वपूर्ण ग्रंथों का उल्लेख किया, जो भगवान महावीर और आचार्य परंपरा पर आधारित ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में मौजूद हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने कहा कि कई प्रकाशित ग्रंथों की प्रस्तावनाओं में पूर्वाचार्यों के परिचय शोधपूर्वक संकलित किए गए हैं।
आचार्यश्री ने यह भी स्पष्ट किया कि उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत सीमित हैं और कई चित्र तथा शिल्पांकन काल्पनिक रूप में बनाए गए हैं। अतः यह आवश्यक है कि संकलन में प्रमाणिक सामग्री का सम्यक उपयोग किया जाए और विभिन्न स्रोतों को ध्यानपूर्वक मिलाकर इतिहास को सुरक्षित रखा जाए।
धर्मसभा में गुरु आस्था परिवार के अध्यक्ष लोकेश जैन, चेयरमैन यतिश जैन खेड़ावाला, महामंत्री नवीन जैन दौराया, राकेश चपलमन, विमल जैन वर्धमान, प्रवीण जैन, मिथुन मित्तल, तरूण और वरूण अरुण, कोषाध्यक्ष अजय जैन खटकीड़ा सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे। इस अवसर पर उपस्थित लोगों ने आचार्य प्रज्ञासागर जी के मार्गदर्शन को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए जैन परंपरा और इतिहास के संरक्षण के लिए एकजुट रहने का संकल्प लिया।
इस कार्यक्रम ने न केवल जैन धर्म की ऐतिहासिक परंपरा और आचार्य परंपरा के महत्व को उजागर किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि वर्तमान पीढ़ी को अपने धार्मिक और ऐतिहासिक ग्रंथों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
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