बकानी में उमड़ा आस्था का सैलाब: पं. कमल किशोर नागर बोले- 'लंका का रावण तो मर गया, पर शंका के रावण को मारना अब भी बाकी'
बकानी के थोबडिया खुर्द में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा में गौ सेवक संत पं. कमल किशोर जी नागर ने समाज को भक्ति और मर्यादा का नया पाठ पढ़ाया। उन्होंने 'शंका के रावण' के विनाश, पाखंड से मुक्ति और माता-पिता की सेवा को ही वास्तविक धर्म बताया। हजारों की भीड़ के बीच बाल संत गोविंद के भजनों ने समां बांध दिया। जानिए नागरजी के वे गुप्त सूत्र जो बदल सकते हैं आपका जीवन।

बकानी (झालावाड़)। भारतीय सनातन संस्कृति की गहराई और भक्ति के वास्तविक स्वरूप को उजागर करते हुए प्रसिद्ध गौ सेवक संत पं. कमल किशोर जी नागर ने थोबडिया खुर्द की धरा पर धर्म की एक नई अलख जगाई है। श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें सोपान के अवसर पर आयोजित इस विराट धर्मसभा में हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने बकानी को लघु काशी के रूप में परिवर्तित कर दिया। अपने ओजस्वी और मर्मस्पर्शी प्रवचनों से नागरजी ने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए जीवन के उन गुप्त सूत्रों को साझा किया, जो मनुष्य को सीधे परमात्मा से जोड़ने का सामर्थ्य रखते हैं।
कथा के केंद्र में नागरजी का वह गंभीर संदेश रहा जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति की मर्यादा और गरिमा तीन चीजों को गुप्त रखने में निहित है—धन, संतन (तप) और नारी का शरीर। उन्होंने वर्तमान युग की विडंबना पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज समाज में आंखें उतनी खराब नहीं हैं, जितनी कि लोगों की नजरें दूषित हो चुकी हैं। उनके अनुसार, भक्ति न तो किसी के दबाव में होनी चाहिए और न ही किसी के प्रभाव या लगाव में; भक्ति तो मनुष्य के सहज स्वभाव का हिस्सा होनी चाहिए। यदि व्यक्ति अपने स्वभाव को मर्यादित और मधुर नहीं रख सकता, तो भौतिक संपन्नता के बावजूद समाज में उसका कोई स्थान नहीं रह जाता।
धार्मिक आयोजनों में बढ़ते पाखंड पर चिंता व्यक्त करते हुए नागरजी ने भक्तों को सचेत किया कि पाखंड अक्सर बड़े लोगों द्वारा फैलाया जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि भक्त पाखंड का मार्ग चुनता है, तो समय उसके लिए कालचक्र बन जाएगा, जबकि भगवान के साथ रहने वाले की रक्षा स्वयं भगवान का सुदर्शन चक्र करता है। उन्होंने जीवन की सार्थकता के लिए शरीर के रोम-रोम में राम नाम बसाने और जीवनकाल में कम से कम साढ़े तीन करोड़ राम नाम जपने का संकल्प लेने का आह्वान किया।
समाज और परिवार की टूटती व्यवस्थाओं पर प्रहार करते हुए उन्होंने एक कड़वा सच उजागर किया कि आज के दौर में नेक काम करने वाले कम और दूसरों के कान भरने वाले लोग अधिक सक्रिय हैं। इसी 'कान भरने' की प्रवृत्ति ने कई हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया है। उन्होंने पारिवारिक शांति का एक अनूठा सूत्र देते हुए कहा कि यदि घर की नारी बुरा बोलने के प्रति मौन (गूंगी) हो जाए और पुरुष बुरा सुनने के प्रति बहरा हो जाए, तो उस घर की खुशहाली को विधाता भी नहीं छीन सकता। उन्होंने युवाओं को प्रेरित किया कि वे अपने माता-पिता की सेवा को ही सर्वोपरि भाग्य मानें, क्योंकि जिनके घर में बुजुर्गों का आशीर्वाद है, वही वास्तव में भाग्यशाली हैं।
कथा के दौरान नागरजी ने रावण के प्रतीक के माध्यम से आधुनिक संशयों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि त्रेता युग में राम ने लंका के रावण का वध तो कर दिया था, लेकिन आज के युग में हर मनुष्य के भीतर पनप रहे 'शंका के रावण' का वध करना स्वयं मनुष्य की जिम्मेदारी है। उन्होंने भक्तों को सलाह दी कि जहाँ शंका हो वहां जाने से बचें और जहाँ सत्संग हो वहां रुकने का प्रयास करें।
इस आध्यात्मिक आयोजन की शुरुआत 11 वर्षीय बाल संत गोविंद के सुमधुर भजनों से हुई। बाल संत के 'कल्याण मेरे इस जीवन का भगवान कब होगा' जैसे भजनों ने पांडाल में उपस्थित प्रत्येक श्रद्धालु को भाव-विभोर कर दिया। नागरजी के इन प्रेरक प्रवचनों और बाल संत की मधुर वाणी ने क्षेत्र के वातावरण को पूरी तरह राममय बना दिया है, जिसका प्रभाव आने वाले लंबे समय तक जनमानस पर बना रहेगा।

Pratahkal Bureau
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