बकानी में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब: पं. कमल किशोर नागर बोले—मकान बड़े हुए पर मन छोटे हो गए, संस्कारों की रक्षा ही असली भक्ति
बकानी के थोबडिया खुर्द में आयोजित भागवत कथा में संत पंडित कमल किशोर नागर ने आधुनिक जीवनशैली और गिरते संस्कारों पर गहरा प्रहार किया। उन्होंने छोटे होते मनों, विदेशी चकाचौंध और पहनावे की मर्यादा पर समाज को जागरूक किया। बाल संत गोविंद के भक्ति संदेश और नंदोत्सव के उल्लास के साथ हजारों भक्तों ने इस आध्यात्मिक आयोजन में सहभागिता की। जानिए कैसे भक्ति से टल सकता है बुरा समय।

बकानी। झालावाड़ जिले के बकानी क्षेत्र अंतर्गत थोबडिया खुर्द गांव में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के चतुर्थ दिवस पर श्रद्धा और अध्यात्म का एक अनूठा संगम देखने को मिला। विख्यात गौसेवक संत पंडित कमल किशोर नागर ने अपने मर्मस्पर्शी प्रवचनों से आधुनिक समाज की विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि आज के कलिकाल में शिक्षित युवाओं के मकान तो बड़े और भव्य हो गए हैं, लेकिन उनके मन संकुचित होते जा रहे हैं। उन्होंने मर्यादाओं के टूटते स्वरूप पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पुराने समय में मकान छोटे हुआ करते थे, परंतु लोगों के हृदय में सबके लिए स्थान था, जो आज के दौर में लुप्त होता जा रहा है।
कथा के दौरान पंडित नागर ने भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद का उल्लेख करते हुए सुख-दुख के समभाव पर प्रकाश डाला। उन्होंने पांडवों के संकट काल में परमात्मा की सहायता का उदाहरण देते हुए भक्तों को आश्वस्त किया कि यदि मनुष्य भक्ति से जुड़ा रहे, तो उसका कठिन समय भी सुगमता से टल जाता है। उन्होंने वर्तमान जीवनशैली पर कटाक्ष करते हुए कहा कि त्रेता युग में प्रभु श्रीराम ने रविवार का दिन भजन और ध्यान के लिए निर्धारित किया था, लेकिन आज का समाज इस पवित्र अवकाश को केवल आमोद-प्रमोद और अभक्ष्य भोजन में व्यर्थ कर रहा है। उन्होंने आह्वान किया कि इस बहुमूल्य समय को आत्म-कल्याण और प्रभु की भक्ति में समर्पित करना चाहिए।
श्रीकृष्ण-रुक्मणी प्रसंग का सजीव वर्णन करते हुए संत नागर ने त्याग और ऋण की महत्ता समझाई। उन्होंने बताया कि जब श्रीकृष्ण के हाथ में चोट लगी, तो महारानी रुक्मणी ने बिना क्षण गंवाए अपनी कीमती साड़ी का पल्लू फाड़कर पट्टी बांध दी थी, जिसके धागों का ऋण स्वयं भगवान ने स्वीकार किया। इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने महिलाओं के पहनावे पर गंभीर संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जिस संस्कृति में द्रौपदी की लाज बचाने के लिए भगवान ने साड़ी को अनंत कर दिया था, उसी भारत भूमि पर आज पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में छोटे और अमर्यादित वस्त्रों का चलन बढ़ रहा है, जो कई अप्रिय घटनाओं का कारण बन रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मर्यादा में रहने वालों की रक्षा ईश्वर स्वयं करते हैं।
भावुक अपील करते हुए पंडित नागर ने माता-पिता को परामर्श दिया कि वे अपने पुत्रों को मात्र धनोपार्जन के लिए विदेश न भेजें। उन्होंने कहा कि अपनी आवश्यकताएं कम कर लेना स्वीकार्य है, लेकिन जिस मां ने नौ माह कोख में पाला, उसके अंतिम समय में यदि पुत्र पास न हो, तो वह धन व्यर्थ है। उन्होंने बीमार और दुखी व्यक्तियों की सेवा को ही सच्ची ईश्वर सेवा बताते हुए कहा कि जो दूसरों के संकट में उनके साथ खड़े होते हैं, परमात्मा पल-पल उनकी मदद करता है। कथा के मध्य नंदोत्सव का आयोजन अत्यंत हर्षोल्लास के साथ किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में मौजूद भक्त भक्ति रस में सराबोर नजर आए।
कार्यक्रम के प्रारंभ में 11 वर्षीय बाल संत गोविंद ने अपने ओजस्वी विचारों से जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने कहा कि सांसारिक जीवन में ब्रह्म बल से भी श्रेष्ठ 'भक्ति बल' है। उन्होंने पाखंड और आडंबर से दूर रहकर वास्तविक भक्ति अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि जिस भक्त के पास भक्ति की पूंजी होती है, उसे यमदूत स्पर्श भी नहीं कर सकते; उसकी अंतिम यात्रा में उसे लेने स्वयं प्रभु राम आते हैं। मालवा और हाड़ौती अंचल से आए हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस धार्मिक आयोजन को एक विशाल जन-आंदोलन का रूप दे दिया।

Pratahkal Bureau
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