झालावाड़। राजस्थान के झालावाड़ जिले में विकास की आड़ में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं, इसकी एक बानगी झालरापाटन क्षेत्र की पंचायतों में देखने को मिल रही है। जहाँ एक ओर जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं दूसरी ओर सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लूटा जा रहा है। ताजा मामला तितरवासा ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले श्योपुर गांव का है, जहाँ एक साधारण शौचालय के निर्माण में पांच लाख रुपये की भारी-भरकम राशि ठिकाने लगा दी गई है। यह घटना न केवल प्रशासनिक मिलीभगत की ओर इशारा करती है, बल्कि सत्ता और रसूख के मेलजोल से हो रहे सार्वजनिक धन के दुरुपयोग को भी उजागर करती है।

घटनाक्रम की शुरुआत तितरवासा ग्राम पंचायत के तितरवासा गांव से होती है, जहाँ राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में सवा लाख रुपये की लागत से एक शौचालय का निर्माण कराया गया। यहाँ जागरूक शिक्षकों की सक्रियता के चलते भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम रही, लेकिन असली खेल इसी पंचायत के श्योपुर गांव में खेला गया। श्योपुर के राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में इसी प्रकार के शौचालय निर्माण के लिए ग्राम विकास अधिकारी चंद्र सिंह झाला द्वारा पांच लाख रुपये का भुगतान उठा लिया गया। जानकारों का मानना है कि जिस कार्य की वास्तविक लागत एक लाख रुपये भी नहीं है, उसमें चार लाख रुपये का सीधा गबन किया गया है। सवाल यह उठता है कि तकनीकी सहायक (JTA) ने इस कार्य की एमबी (Measurement Book) किस आधार पर भरी और टाइड-अनटाइड फंड का यह दुरुपयोग कैसे संभव हुआ।

इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक नियुक्तियों और राजनीतिक संरक्षण की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। चर्चा है कि झालरापाटन पंचायत समिति में विकास अधिकारी महेश मीणा की नियुक्ति एक पूर्व प्रधान के रसूख के चलते की गई है। हालांकि ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर मीणा की कार्यशैली को लेकर अधिकारियों में भय की बात कही जाती है, लेकिन झालावाड़ की स्थानीय राजनीति में उनके निर्देशों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। उच्च अधिकारियों के बीच "क्लासमेट" होने का तालमेल भ्रष्टाचार को और अधिक खाद-पानी दे रहा है। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम विकास अधिकारी चंद्र सिंह झाला, जिनके पास नियमविरुद्ध तरीके से चार-चार पंचायतों का कार्यभार है, कर्जदारों के डर से मुख्यालय से नदारद रहते हैं, फिर भी उन पर मेहरबानी बरकरार है।

पंचायत की जमीनी हकीकत यह है कि यहाँ निर्वाचित महिला सरपंच केवल नाममात्र की प्रतिनिधि बनकर रह गई हैं, जबकि पंचायत का वास्तविक संचालन भाजपा के एक नेता का पुत्र कर रहा है। राजनीतिक गलियारों में मनीष चांदवाड़ को जिला उपाध्यक्ष और प्रधान को महिला मोर्चा की जिला अध्यक्ष बनाने की चर्चाएं आम हैं, जिससे जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि भ्रष्टाचार में लिप्त चेहरों को दंड देने के बजाय पुरस्कृत किया जा रहा है। वर्तमान में विधायक और सांसद की इस विषय पर चुप्पी जनता के रोष को और भड़का रही है।

झालावाड़ में भ्रष्टाचार की यह "गंगा" जिस वेग से बह रही है, उसने आमजन के विश्वास को झकझोर कर रख दिया है। सवा लाख के काम को पांच लाख में तब्दील करने की यह जादुई कला अब भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच का विषय बन चुकी है। लोकतंत्र में जब जनता का आक्रोश चरम पर होता है, तो वह बड़े-बड़े सिंहासनों को हिलाने की क्षमता रखता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन दोषियों पर नकेल कसता है या फिर भ्रष्टाचार का यह सिलसिला यूं ही बेखौफ जारी रहता है।

Pratahkal Bureau

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