झालरापाटन: सालरिया गांव में पेयजल संकट, ग्रामीणों को पानी के लिए संघर्ष
झालावाड़ जिले की ग्राम पंचायत सालरिया में पानी की पाइपलाइन बिछने के दावों के बाद भी ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए मजबूर हैं।

झालरापाटन की सालरिया ग्राम पंचायत में भीषण जल संकट के चलते ग्रामीण दूर-दराज से पानी लाकर अपनी दैनिक जरूरतें पूरी करने को मजबूर हैं।
झालरापाटन की ग्राम पंचायत सालरिया में जल संकट केवल एक सामान्य समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और विकास कार्यों के दावों की पोल खोलती एक गंभीर विसंगति बन चुका है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरकारी खजाने से लाखों रुपए खर्च किए गए, योजनाओं के भव्य उद्घाटन हुए और फाइलों में पाइप लाइनें बिछा दी गईं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी ग्रामीण पेयजल की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं। भीषण गर्मी की दस्तक के साथ ही सालरिया में जल संकट ने विकराल रूप धारण कर लिया है। सुबह होते ही गांव की गलियों में मटकों और बाल्टियों की लंबी कतारें एकमात्र कुएं के पास दिखाई देती हैं, जो व्यवस्था की विफलता को दर्शाती हैं।
सरकारी रिकॉर्ड में विकास की गाथाएं दर्ज हैं, परंतु भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी तलाई अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। ग्रामीणों के अनुसार, गांव में पानी की टंकी होने के बावजूद पिछले आठ दिनों से एक बूंद पानी भी नहीं टपका है। विकट स्थिति यह है कि न केवल इंसानों के लिए पीने के पानी का अभाव है, बल्कि मूक पशुओं के लिए भी जल का कोई प्रबंध नहीं है। कालाकोट गांव में स्थित हैण्डपंप केवल शो-पीस बनकर रह गए हैं, जो किसी भी कार्य के नहीं हैं। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि निरीक्षण के नाम पर अधिकारी बार-बार आते हैं, लेकिन समस्या के स्थायी समाधान हेतु कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
स्थानीय निवासियों का मानना है कि 'ऊंट के मुंह में जीरा' वाली कहावत यहां पूरी तरह चरितार्थ हो रही है, जहां करोड़ों की योजनाएं भी गांव की प्यास बुझाने में असमर्थ हैं। विकास के नाम पर खर्च हुआ लाखों का बजट किस मद में और कहां समा गया, यह एक बड़ा प्रश्न है, जिसकी निष्पक्ष जांच होने पर कई जिम्मेदार चेहरों की चमक फीकी पड़ सकती है। पंचायत की बैठकों में बार-बार समस्या उठाने के बावजूद जिम्मेदारों ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। स्थिति यह है कि कागजों में विकास की गंगा बह रही है, परंतु धरातल पर जनता बूंद-बूंद को मोहताज है। यह व्यवस्था का वह क्रूर चेहरा है, जहां योजनाएं फोटो खिंचवाने तक तो सक्रिय रहती हैं, लेकिन जनता तक पहुंचते-पहुंचते दम तोड़ देती हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि लाखों रुपए व्यय करने के बाद भी गांव में पेयजल की स्थायी व्यवस्था क्यों सुनिश्चित नहीं हो पाई? क्या विकास केवल टेंडर, बिल और भुगतान तक ही सीमित है? यदि समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई, तो आने वाले दिनों में यह संकट और अधिक गंभीर रूप धारण कर सकता है। अब ग्रामीण एकजुट होकर पानी की योजनाओं की निष्पक्ष जांच, अधूरे कार्यों को पूर्ण करने और लापरवाह अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। जनता अब खोखले आश्वासनों से थक चुकी है और केवल अपने अधिकार का पानी मांग रही है।

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