झालरापाटन। भगवान श्री द्वारकाधीश, जिन्हें लक्ष्मीपति, सृष्टि रचयिता और जगत के पालनहार के रूप में पूज्य जाता है, आज तक अपने असली आभूषणों में श्रृंगार के दर्शन से वंचित हैं। मंदिर के जेवर, जिनमें सोने-चांदी, मोती-माणिक, पन्ना और अन्य अमूल्य धरोहर शामिल हैं, करीब 53 वर्षों से रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हैं।

स्थानीय श्रृद्धालुओं की मानें तो करोड़ों रुपए मूल्य के ये जेवर देवस्थान विभाग की तिजोरी में सुरक्षित हैं, जबकि कुछ लोग चोरी की आशंका भी व्यक्त कर रहे हैं। विभाग ने मामले पर गोपनीयता का हवाला देते हुए कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी। विशेषज्ञों और पुरातन विद्वानों का कहना है कि सार्वजनिक मंदिर में ऐसी अमूल्य संपत्ति की पारदर्शिता होना आवश्यक है।

श्रृद्धालु यह चाहते हैं कि भगवान द्वारकाधीश का श्रृंगार उनके वास्तविक आभूषणों से प्रतिदिन विधिपूर्वक किया जाए ताकि दर्शनार्थियों को उनका वास्तविक रूप देखने का अवसर मिले। बुजुर्ग बताते हैं कि मंदिर की इतिहासिक किंवदंतियों के अनुसार भगवान श्री कृष्ण संदीपनी आश्रम से लौटते समय इसी मार्ग से विश्राम करते हुए यहाँ ठहरे थे। झालावाड़ और गागरोन राज परिवार के लिए भी यह मंदिर आस्था का केंद्र रहा है।

जानकारी के अनुसार, भगवान द्वारकाधीश द्वारा पहने गए माला और आभूषणों का लेखा-जोखा पारंपरिक रूप से तत्तकालीन तहसीलदार, मंदिर प्रबंधक और नगर के गणमान्य श्रृद्धालुओं के हस्ताक्षर सहित सुरक्षित किया जाता था। भोग लगाने के पश्चात उसका वितरण भी ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार होता रहा है।

स्थानीय श्रृद्धालु और मंदिर भक्त अब यह आशा रखते हैं कि विभाग इस अमूल्य संपत्ति का पारदर्शी लेखा-जोखा प्रकाशित करे और भगवान द्वारकाधीश का वास्तविक श्रृंगार पुनः शुरू हो। यह मामला न केवल धार्मिक आस्था का विषय है, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।

अगले अंक में श्रृद्धालु अपने प्रमाणित लेखा-जोखा के साथ इस मामले में और तथ्य प्रस्तुत करेंगे।

Pratahkal Bureau

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