झालरापाटन। एक कलाकार जब अपनी तूलिका उठाता है, तो वह केवल दीवारों को नहीं रंगता, बल्कि शहर की अस्मिता और पहचान को जीवंत करता है। लेकिन जब वही कलाकार अपनी मेहनत की कमाई के लिए सात वर्षों तक व्यवस्था की चौखट पर एड़ियां रगड़ने को मजबूर हो जाए और अंततः निराशा में अपने पदक और सम्मान लौटाने का निर्णय ले ले, तो यह प्रश्न खड़ा होता है कि क्या हमारे समाज में कला की कोई कीमत बची है? झालावाड़ जिले के ऐतिहासिक शहर झालरापाटन से एक ऐसी ही मर्मस्पर्शी और आक्रोशित करने वाली खबर सामने आई है, जहाँ मशहूर जुगनू पेंटर ने जिला प्रशासन और नगरपालिका द्वारा दिए गए सम्मानों को वापस करने का ऐलान कर दिया है।

यह कहानी वर्ष 2018 में शुरू हुई थी, जब झालरापाटन के ऐतिहासिक मुख्य दरवाजों के कायाकल्प के लिए नगरपालिका ने पुताई और चित्रकारी का ठेका निकाला। जुगनू पेंटर ने इस निविदा को हासिल किया, लेकिन तकनीकी पेच और नेगोशिएशन के कारण पत्रावली फाइलों में दबी रही। उस वक्त दीपावली का पर्व और स्वच्छता सर्वेक्षण का दबाव सिर पर था। तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष और प्रशासनिक अधिकारियों ने शहरहित का वास्ता देते हुए जुगनू पेंटर को भरोसा दिलाया कि भुगतान की औपचारिकताएं बाद में पूरी कर ली जाएंगी, फिलहाल कार्य शुरू किया जाए। प्रशासन के भरोसे और मातृभूमि के प्रति कर्तव्य की भावना से ओतप्रोत होकर जुगनू पेंटर ने बिना वर्क ऑर्डर के, अपने निजी बजट से लाखों रुपये खर्च कर दरवाजों पर ऐसी नक्काशी और चित्रकारी की कि जर्जर दीवारें बोल उठीं। पूरा शहर इस कलाकारी का मुरीद हो गया और जिला प्रशासन सहित नगरपालिका ने मंचों से जुगनू पेंटर की प्रशंसा करते हुए उन्हें प्रशस्ति पत्रों से नवाजा।

विडंबना देखिए, जैसे ही काम खत्म हुआ, प्रशंसा के स्वर फाइलों की धूल में दब गए। जब भुगतान का समय आया, तो वही प्रशासन जिसने काम के लिए हाथ जोड़े थे, तकनीकी खामियों का हवाला देकर पल्ला झाड़ने लगा। पिछले बोर्ड में अध्यक्ष और पार्षदों के आपसी अंतर्कलह और वर्तमान अध्यक्ष की इच्छाशक्ति की कमी ने इस कलाकार को कर्ज और मानसिक तनाव के दलदल में धकेल दिया। सात साल के लंबे इंतजार और आर्थिक तंगी का आलम यह रहा कि पिछले वर्ष जुगनू पेंटर को पैरालिसिस (लकवा) का अटैक आ गया, जिससे वे आज बेरोजगार और लाचार हो चुके हैं। सत्ता और प्रशासन की इस संवेदनहीनता से आहत होकर उन्होंने अब जिला कलेक्टर और पालिका द्वारा दिए गए 'खोखले' सम्मानों को वापस करने का निर्णय लिया है।

इस मामले ने अब राजनीतिक और सामाजिक मोड़ ले लिया है। पार्षद नदीम मंसूरी और उनके साथियों ने खुलकर जुगनू पेंटर का समर्थन किया है। नदीम मंसूरी ने तीखे शब्दों में कहा कि यदि प्रशासन एक कलाकार को उसका जायज मेहनताना नहीं दे सकता, तो ऐसे सम्मानों की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने घोषणा की है कि झालरापाटन की जनता अब स्वयं अपने स्तर पर राशि एकत्रित कर जुगनू पेंटर को सौंपेगी। साथ ही, उन्होंने जनसुनवाई के आयोजनों को महज एक 'नाटक' करार देते हुए प्रशासन की कड़ी निंदा की है। यह घटना केवल एक पेंटर के बकाया भुगतान की नहीं, बल्कि उस भरोसे के टूटने की है जो एक आम नागरिक अपनी सरकार पर करता है।

Pratahkal Bureau

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