बरसात की पहली फुहार के साथ ही झालरापाटन शहर में गंदगी ने मानो स्थायी डेरा जमा लिया है। शहर के कई हिस्सों में जलभराव, बजबजाती नालियां, कचरे के ढेर और उनसे उठती दुर्गंध ने आमजन की परेशानी बढ़ा दी है। हालात ऐसे हैं कि मच्छर और कीट-पतंगे तेजी से पनप रहे हैं, जबकि सफाई व्यवस्था कागजों से बाहर निकलती नजर नहीं आ रही।

नगरपालिका हर वर्ष सफाई, फॉगिंग और मच्छर नियंत्रण के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने का दावा करती है, लेकिन शहर की गलियों की स्थिति इन दावों से अलग तस्वीर पेश कर रही है। कई स्थानों पर नालियां जाम हैं, बारिश का पानी दिनों तक जमा रहता है और गंदगी संक्रामक बीमारियों को खुला निमंत्रण देती दिखाई दे रही है।

शहरवासियों का कहना है कि यदि कागजों में दर्ज सफाई कार्य वास्तव में धरातल पर दिखाई देता, तो शायद मच्छरों को भी दूसरा ठिकाना तलाशना पड़ता। उनका आरोप है कि मौजूदा व्यवस्था में सफाई अभियान से अधिक मजबूत व्यवस्था गंदगी की नजर आती है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि झालरापाटन में अब दो सरकारें चल रही हैं, एक नगरपालिका की और दूसरी मच्छरों की। उनका कहना है कि दोनों में फर्क केवल इतना है कि मच्छरों की मौजूदगी जनता को हर दिन दिखाई देती है, जबकि सफाई व्यवस्था का असर नजर नहीं आता।

बरसात के मौसम में डेंगू, मलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि यदि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर को गंदगी और जलभराव से राहत नहीं मिल रही, तो आखिर इसकी जिम्मेदारी किसकी तय होगी।

अब शहरवासियों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नगरपालिका केवल दावों तक सीमित रहेगी या सड़कों और मोहल्लों में प्रभावी सफाई भी कराएगी। नागरिकों का कहना है कि करों से भरी नगरपालिका की तिजोरी का लाभ यदि केवल फाइलों तक सीमित रह जाए, तो शहर का विकास नहीं, बल्कि मच्छरों का विकास होता है।

Pratahkal Bureau

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