झालावाड़। राजस्थान की धर्मधरा झालावाड़ के झालरापाटन क्षेत्र में आस्था का एक ऐसा सैलाब उमड़ने वाला है, जिसकी गूँज दूर-दराज के इलाकों तक सुनाई देगी। झालावाड़ से महज 22 किलोमीटर दूर स्थित भँवरासा ग्राम में सदियों से जन-जन की रक्षक बनीं माँ कालका के दरबार को अब नया और भव्य स्वरूप मिल चुका है। करीब 600 वर्षों पूर्व जमीन से प्रकट हुई दिव्य प्रतिमा की महिमा ऐसी है कि यहाँ न केवल नवरात्रि, बल्कि साल के प्रत्येक दिन भक्तों का तांता लगा रहता है। अब इसी आस्था को नए शिखर पर ले जाते हुए मंदिर समिति द्वारा आगामी 27 जनवरी से एक विशाल प्राण प्रतिष्ठा समारोह का आयोजन किया जा रहा है, जो क्षेत्र के धार्मिक इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ने के लिए तैयार है।

इस प्राचीन सिद्धपीठ की उत्पत्ति की गाथा भी किसी चमत्कार से कम नहीं है। स्थानीय निवासी और मंदिर समिति के सक्रिय सदस्य गजराज सिंह झाला बताते हैं कि यहाँ विराजित कालका माता की मूर्ति लगभग छह शताब्दियों पुरानी है। लोक मान्यताओं के अनुसार, उनके पूर्वजों को माता ने स्वप्न में दर्शन देकर अपने स्थान का संकेत दिया था। जब बताए गए स्थान पर खुदाई की गई, तो माँ कालका के साथ अन्य देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियां भूमि से प्रकट हुईं। तभी से इस स्थान को जागृत देवस्थान मानकर पूजा-अर्चना की जा रही है। यहाँ अखंड ज्योति दशकों से प्रज्वलित है, जो भक्तों के अटूट विश्वास का प्रतीक बनी हुई है।

भँवरासा स्थित कालका माता को न केवल ग्राम-देवी, बल्कि कई परिवारों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। यहाँ 'जडुलिया' (मुंडन संस्कार) उतारने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। ग्रामीण अपनी संतान की सुख-समृद्धि की मन्नत पूरी होने पर यहाँ मुंडन संस्कार करवाते हैं और हर्षोल्लास के साथ रसोई व भंडारे का आयोजन करते हैं। विशेष रूप से चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान यहाँ का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है, जहाँ श्रद्धालु सुबह की आरती से लेकर देर रात तक माँ के चरणों में शीश नवाने पहुँचते हैं।

आगामी महोत्सव को लेकर मंदिर समिति ने व्यापक तैयारियां पूर्ण कर ली हैं। गजराज सिंह झाला ने कार्यक्रम की विस्तृत रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि पांच दिवसीय यह प्राण प्रतिष्ठा समारोह 27 जनवरी से शुरू होकर 31 जनवरी तक चलेगा। उत्सव का शुभारंभ 27 जनवरी को हिमाद्री स्नान, भव्य जल यात्रा और मंडप प्रवेश के साथ होगा। 28 जनवरी को अग्नि स्थापना और नित्य पूजन के विधान किए जाएंगे। महोत्सव का विशेष आकर्षण 30 जनवरी को आयोजित होने वाला भव्य नगर भ्रमण होगा, जिसमें माता की सवारी पूरे क्षेत्र का भ्रमण करेगी। अंततः 31 जनवरी को अभिजीत मुहूर्त में देवी की प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही महाप्रसादी के साथ इस धार्मिक महाकुंभ का समापन होगा। यह आयोजन न केवल भँवरासा बल्कि संपूर्ण झालरापाटन क्षेत्र के लिए आध्यात्मिक चेतना का नया केंद्र बनकर उभरेगा।

Pratahkal Bureau

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