झालावाड़: चरागाह भूमि पर अवैध कब्जा, प्रशासन की चुप्पी से ग्रामीणों में आक्रोश
झालावाड़ के तितरी गांव में चरागाह भूमि पर भू-माफिया का कब्जा और निर्माण जारी है, प्रशासनिक निष्क्रियता के खिलाफ ग्रामीण उच्च न्यायालय जाने की तैयारी कर रहे हैं।

झालावाड़ जिले में चरागाह भूमि का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब यह भूमि मवेशियों के चरने के बजाय भू-माफियाओं के अवैध कब्जों और निर्माणों का केंद्र बनती जा रही है। स्थिति यह है कि अदालती आदेशों और सरकारी गाइडलाइनों के सख्त निर्देश फाइलों में दबे पड़े हैं, जबकि धरातल पर जेसीबी मशीनें सीमांकन मिटाकर अवैध निर्माणों को अंजाम दे रही हैं। तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं, जहां न केवल कार्रवाई ठप है, बल्कि अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी करने तक की औपचारिकता भी पूरी नहीं की जा रही है।
इस भ्रष्टाचार और प्रशासनिक शिथिलता का जीता-जागता उदाहरण ग्राम पंचायत तितरवास का गांव तितरी है। यहां की चरागाह भूमि पर चारा उगने के स्थान पर अस्सी बंगले खड़े हो चुके हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि अतिक्रमी इस बात से बेफिक्र हैं कि पटवारी के साथ उनकी मिलीभगत है, जो उन्हें हर स्तर पर बचाने के लिए प्रतिबद्ध है। स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं है। तहसीलदार कार्यालय की आश्चर्यजनक खामोशी सीधे तौर पर सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और राजस्थान सरकार के आदेशों की अवहेलना करती प्रतीत होती है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में स्वयं को भाजपा नेता बताने वाले आदेश कुमार की भूमिका संदेह के घेरे में है, जिसने चरागाह भूमि पर अपने खेतों में पानी पिलाने के लिए अवैध कुएं का निर्माण करवा रखा है।
प्रशासन की इस कार्यशैली को "सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे" की नीति के रूप में देखा जा रहा है। मामले को जानबूझकर ठंडे बस्ते में डाला गया है ताकि ऊपर के अधिकारियों को जवाब भी दिया जा सके और कब्जाधारियों पर कोई सीधी कार्रवाई भी न हो। ग्रामीणों के बीच अब यह धारणा प्रबल हो गई है कि प्रशासन की चुप्पी बिना किसी "मौन सहमति" के संभव नहीं है। चरागाह भूमि का मूल उद्देश्य मवेशियों के लिए चारा उपलब्ध कराना और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना था, परंतु अब वहां खुदाई और निजी उपयोग का खेल चल रहा है।
शिकायतें दर्ज होने के बावजूद तहसीलदार कार्यालय का नोटिस जारी न करना यह स्पष्ट करता है कि कलम किसी भारी दबाव में रुकी हुई है। "जब रखवाला ही खेत खाने लगे, तो फसल बचाए कौन?"—यह कहावत वर्तमान में झालावाड़ प्रशासन पर सटीक बैठती है। ग्रामीणों का आक्रोश इस बात पर अधिक है कि प्रशासन का डंडा केवल छोटे किसानों पर चलता है, जबकि रसूखदार कब्जाधारियों के सामने प्रशासन की आंखें मूंद ली जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट और राज्य सरकार के बार-बार दिए गए आदेश केवल कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं, जिनकी स्थिति "ऊंट के मुंह में जीरे" जैसी है। यदि प्रशासन ने समय रहते सख्त रुख नहीं अपनाया, तो न केवल गांवों में पशुओं के लिए भूमि का अभाव हो जाएगा, बल्कि न्यायपालिका और कानून की साख भी धूल में मिल जाएगी। फिलहाल, ग्रामीण न्यायालय की अवमानना को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं।

