झालरापाटन की झूमकी पंचायत में वन भूमि खुदाई के जुर्माने की भरपाई के लिए बिना हस्ताक्षर के करीब दो लाख रुपये का फर्जी ग्रेवल बिल पास कराने का मामला आया सामने।

झालावाड़ जिले की झालरापाटन पंचायत समिति की ग्राम पंचायत झूमकी में विकास कार्यों के नाम पर भ्रष्टाचार, चरागाह और वन भूमि की खुदाई तथा फर्जी बिलों के जरिए सरकारी राशि उठाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। ग्रामीणों ने पंचायत प्रशासन, पंचायत समिति अधिकारियों और सामग्री सप्लायर की मिलीभगत का आरोप लगाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

ग्रामीणों के अनुसार ग्राम पंचायत झूमकी में पंचायत व्यवस्था पर जनप्रतिनिधियों का नहीं, बल्कि सरपंच, सचिव, विकास अधिकारी और सामग्री सप्लायर का नियंत्रण चल रहा है। पंचायत राज विभाग के अधिकारियों पर भी कमीशनखोरी के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि पंचायत समिति के विकास अधिकारी महेश मीणा ने मिलीभगत के चलते अपराधी प्रवृत्ति के नेपाल सिंह को संरक्षण दिया, जिसका सामग्री सप्लाई का टेंडर पिछले छह वर्षों से लगातार चल रहा है।

ग्रामीणों ने बताया कि नेपाल सिंह पूर्व में चौथ वसूली के आरोप में जेल जा चुका है। आरोप है कि उसकी फर्म द्वारा वन भूमि खोदकर पंचायतों में लाखों रुपए के भुगतान उठाए गए। ग्रामीणों की शिकायत पर वन विभाग ने कार्रवाई करते हुए वन भूमि की खुदाई करते समय सामग्री जब्त की थी और करीब डेढ़ लाख रुपए का जुर्माना लगाया था। इसके बावजूद जुर्माना राशि की भरपाई के लिए करीब दो लाख रुपए का ग्रेवल बिल लगा दिया गया।

ग्रामीणों का आरोप है कि यह बिल पूरी तरह फर्जी है। बिल पर न तो ग्राम विकास अधिकारी के हस्ताक्षर हैं और न ही सरपंच के हस्ताक्षर मौजूद हैं। इतना ही नहीं, बिल में कार्य का नाम भी दर्ज नहीं किया गया। इसके बावजूद भुगतान प्रक्रिया पूरी कर ली गई।

गांव में चर्चा है कि पंचायत में वास्तविक विकास कार्यों की तुलना में कागजी काम अधिक हो रहे हैं। जिन चरागाह और वन भूमि क्षेत्रों को संरक्षित किया जाना चाहिए था, वहां मशीनों से खुदाई कर लाखों रुपए के भुगतान उठा लिए गए। ग्रामीणों का कहना है कि कागजों में मिट्टी भराई, सड़क सुधार और अन्य विकास कार्य दर्शाकर सरकारी राशि निकाली गई, जबकि धरातल पर हालात अलग दिखाई देते हैं।

मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि चरागाह और वन भूमि में खुदाई और कार्यों की अनुमति किस स्तर पर दी गई। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित अधिकारियों ने पूरे मामले में आंखें मूंदे रखीं। पंचायत के कुछ जिम्मेदार लोगों पर पहले से गंभीर मामलों के आरोप होने के बावजूद विकास कार्यों की जिम्मेदारी उन्हीं के हाथों में बनी रही।

सूत्रों के अनुसार चरागाह भूमि की खुदाई से पर्यावरण और पशुधन दोनों प्रभावित हुए हैं। पशुपालकों के सामने चारे का संकट गहराने लगा है, लेकिन पंचायत प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा रहा। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पंचायत में नियमों को दरकिनार कर मनमाने तरीके से कार्य किए जा रहे हैं और सरकारी धन के उपयोग में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।

अब पूरे मामले में प्रशासनिक कार्रवाई और जांच को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों ने मांग की है कि चरागाह और वन भूमि की खुदाई, फर्जी बिलों और सरकारी भुगतान की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो झूमकी ग्राम पंचायत का यह मामला बड़े घोटाले के रूप में सामने आ सकता है। विकास के नाम पर चरागाह और वन भूमि के दोहन से ग्रामीणों में भारी आक्रोश बना हुआ है।

Pratahkal Bureau

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